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आरक्षण के बहाने

आज आरक्षण की मांग और इसे देने का काम केवल और केवल राजनीतिक आधार और पैमानों पर हो रहा है।

Author दिल्ली | April 23, 2016 1:55 AM
Jat Stir Violence, CBI Probe, Haryana Govt, jat reservation latest news, jat reservation, jat Agitationजाट आरक्षण की मांग को लेकर रोहतक में उपद्रवियों द्वारा जलाई गईं दुकानें। (पीटीआई फाइल फोटो)

लगता है, आज आरक्षण तमाम आर्थिक व सामाजिक बीमारियों के लिए मुख्य औषधि सिद्ध होने की ओर अग्रसर है। तभी तो समाज की मुकम्मल और संपन्न जातियां भी किसी भी हद तक जाकर यह रामबाण औषधि पाने को लालायित दिख रही हैं। आरक्षण देने के असल मायनों को आज बेबुनियाद और निरर्थक दलीलें दे-देकर बेमानी और खोखला किया जा रहा है। आरक्षण किन-किन कारणों से क्यों और किन्हें दिया जा रहा है इस मानवीय दृष्टि से आज कोई सोचने की स्थिति में नहीं दिख रहा है। बस चहुंओर जातीय, धार्मिक नारे बोलने-बुलवाने का अहं ही सर चढ़ कर बोलता दिख रहा है। आज आरक्षण हाशिये पर धकियाए गए अल्पसंख्यक, दलित, वंचित-पिछड़ों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए सहारा देने वाली लाठी नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक रूप से समृद्ध लोगों का लट्ठ बन गया है। और लोकतंत्र भी तो लट्ठतंत्र में ही तब्दील होता जा रहा है! फिर किसी ने सही ही कहा है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस!

आज आरक्षण की मांग और इसे देने का काम केवल और केवल राजनीतिक आधार और पैमानों पर हो रहा है। यह आए दिन समाज में घटित होने वाली घटनाएं कह रही हैं। गुजरात के पाटीदारों का आरक्षण लेने का आंदोलन पिछले सालभर से किसी और तरह से संचालित हो रहा था लेकिन हरियाणा के जाट आरक्षण आंदोलन से सबक लेते हुए पिछले दिनों उन्होंने भी आंदोलन के तरीकों में मात्रात्मक व गुणात्मक परिवर्तन कर दिखाया है। इसके परिणामस्वरूप 18 अप्रैल को पटेलों की हिंसक भीड़ द्वारा सरकारी इमारतों में आगजनी, सार्वजनिक बसों व अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुंचाना, पुलिस वाहनों को जलाना, प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिसकर्मियों पर पथराव के रूप में सामने आ रहा है। सालभर पहले पटेल आंदोलन में ग्यारह बेकसूर नागरिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था जिससे न तो आंदोलनकारियों ने और न सरकार ने कुछ सबक लिया लगता है।

केंद्र और राज्य के राजनीतिक आकाओं को चाहिए कि हरियाणा जैसा या इससे भी क्रूर-हिंसक कुछ होने से पहले ही गंभीर संज्ञान लें और पटेलों को बेहिचक आरक्षण दे दें! आज नहीं तो कल देना ही पड़ेगा, समय रहते समझ और संभल जाएं तो उसी में समझदारी बनती है! क्योंकि ये भी हरियाणा के जाटों की तरह आर्थिक, सामाजिक, जातीय, धार्मिक और राजनीतिक हर तरह से सशक्त हैं। फिर यादवों, गुर्जरों, कुर्मियों आदि को भी तो आरक्षण दिया ही जा चुका है। आंध्र प्रदेश के कापु समुदाय, ब्राह्मण, राजपूत, ठाकुर, बनिये आदि भी लाइन में खड़े हैं तो इसमें गलत क्या है? ये हिंसक और उग्र नहीं हो रहे हैं तो क्या सरकार और नेता इनकी सुनेंगे ही नहीं? जाटों ने एक परंपरा और लीक डाल दी है जिसे सभी ताकतवर जातियों के लोग उससे भी आगे बढ़कर प्रयोग कर रहे हैं या लाजिमी तौर पर करेंगे ही। (मुकेश कुमार, महावीर एन्कलेव, दिल्ली)
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शुभ लक्षण
सुना है, पिछले दिनों कश्मीरी मुस्लिम महिलाओं ने एक अभूतपूर्व काम किया। उन्होंने मिल कर सूर्य देव से दुआ मांगी: ‘कश्मीरी पंडितों को वापस भेजना नहीं तो हम भी बाहर ही धूप में बैठेंगी।’ वादी में भाईचारे की अगर ऐसी फिजा बन रही है तो निश्चित तौर पर कश्मीर-कुंडली के लक्षण शुभ हैं। (शिबन कृष्ण रैणा, अलवर)
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उत्तराखंड में न्याय
उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन हटाने का नैनीताल उच्च न्यायालय का फैसला महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। मामले की सुनवाई के दौरान ही न्यायालय की कठोर टिप्पणियों के मद्देनजर इसे अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता। उसने कहा था कि राष्ट्रपति राजा नहीं हैं और वे भी गलती कर सकते हैं। इसलिए उनके निर्णय भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं। केंद्र सरकार और भाजपा की इस फैसले से बहुत किरकिरी हुई है। यह सही है कि राज्य सरकारों के भाग्य का फैसला विधानसभा में होना चाहिए न कि राज भवन या राष्ट्रपति भवन में, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने बोम्मई मामले में दिए निर्णय में कहा था। संविधान और 356 अनुच्छेद का सम्मान करना चाहिए।

मोदीजी जब से प्रधानमंत्री बने हैं तभी से वे कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रहे हैं। इसे अमली जामा पहनाने के लिए कांग्रेस सरकारों को चुन-चुन कर निशाना बना रहे हैं। वैसे प्रजातंत्र में ऐसा विचार ठीक नहीं, विपक्ष का महत्त्व है। लेकिन विचार है भी तो उन्हें धैर्य रखना चाहिए और चुनाव से, न कि 356 वे अनुच्छेद के दुरुपयोग से एकछत्र राज का सपना देखना चाहिए। कांग्रेस एक आदर्श पार्टी बिलकुल नहीं है, वहां भी निजी स्वार्थ, भ्रष्टाचार और गुटबाजी जनतांत्रिक मूल्यों पर भारी हैं। हरीश रावत के स्टिंग ऑपरेशन का वीडियो भी इसकी एक बानगी है। लेकिन ये सब तर्क मिल कर भी केंद्र सरकार के कृत्य को संवैधानिक नहीं ठहराते। (कमल जोशी, अल्मोड़ा)
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गुणवत्ता की खातिर
सड़क निर्माण में गुणवत्ता को लेकर हमेशा संशय बना रहता है। यह आम है कि भारी राशि खर्च करके कोई सड़क तैयार की जाती है और बारिश या वाहनों के दबाव से कुछ ही समय बाद उसके टूटने की खबर आ जाती है। इसी के मद्देनजर कुछ अरसा पहले ग्रामीण विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते हुए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनाई जा रही सड़कों की गुणवत्ता की सख्त निगरानी सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री ने एक प्रभावशाली तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया। यह छिपी बात नहीं है कि सड़क निर्माण की निविदा निकलने से लेकर सामग्री की खरीद, निर्माण और रख-रखाव तक भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है।

पिछले आठ-दस सालों के दौरान देश भर में सड़कों का जाल बिछाने की कोशिश की गई, बहुत सारे दूरदराज के इलाकों को मुख्य सड़कों से जोड़ा गया। खासकर जब से प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना की शुरुआत हुई, उसके बाद इस क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल हुई। लेकिन सवाल है कि इतने बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण के साथ क्या गुणवत्ता का भी खयाल रखा गया? इसका अंदाजा सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि कई जगहों पर महज दो-तीन साल पहले की बनी हुई सड़कों की भी आज इस कदर दुर्दशा है कि उन पर सहज तरीके से वाहन न चल पाएं। (अनिल धीमान, नंदनगरी, दिल्ली)

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