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चौपाल: संगीत का समाज

सामाजिक अपराधों को कम करने के लिए कुछ दूसरे प्रयोगों को अपनाना होगा। आपधारिक प्रवृत्तियों को रोकने के लिए रचनात्मक और सृजनात्मक विकास में संगीत का योगदान संभव है। मानवीय व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया में, जिसमें अनुशासन और कलाओं का अपना अलग महत्त्व है, संगीत का इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

Author November 26, 2020 8:53 AM
Danceसंगीत को बना लिया जीवन का आधार । फाइल फोटो।

भारतीय संगीत प्राचीन काल से भारत में सुना जाने वाला और विकसित होता संगीत है। हमारे यहां संगीत का प्रारंभ वैदिक काल से पूर्व का है। मूल स्रोत वेदों से माना जाता है। सामान्यत: भारतीय संगीत को तीन भागों में बांटा जाता है। शास्त्रीय संगीत, उप शास्त्रीय संगीत और सुगम संगीत तथा प्रमुख दो पद्धतियां हिंदुस्तानी और कर्नाटक है। हमारी शिक्षा पद्धति में संगीत की शिक्षा की अनिवार्यता का अभाव है। संगीत की शिक्षा के माध्यम से बच्चों का संर्वांगीण विकास संभव है। बच्चों में सृजनात्मकता और रचनात्मकता के विकास के लिए शिक्षा में संगीत का होना आवश्यक है।

जीवन में कलाओं का एक विशेष महत्त्व है और संगीत भी एक कला है। भारतीय संस्कृति में संगीत का महत्त्व शुरू से ही रहा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों को समझने के लिए संगीत के माध्यम से लोक गीतों, लोक वाद्यों, रीति-रिवाजों को प्रस्तुत करने की परंपरा है। संगीत की शिक्षा के अभाव में नई पीढ़ी पाश्चात्य संगीत की ओर आकर्षित होती गई। संगीत के क्षेत्र में रोजगार के अवसरों की भी कमी है। संगीत शिक्षा को आकर्षक बनाने के साथ ये प्रयास बेरोजगारी को दूर करने में भी सार्थक हो सकते हैं।

अगर संगीत की शिक्षा को महत्त्व दिया जाता है तो इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। संगीत की साधना से मानसिक संतुलन भी स्वस्थ रहता है। इससे अपराध की प्रवृत्ति और मानसिकता में बदलाव होगा और उसे रोकने में कुछ सफलता मिल सकती है। हम यह देख चुके है कि कानून और सजा के प्रावधानों से समाज में अपराधों में कोई कमी नहीं हुई है।

सामाजिक अपराधों को कम करने के लिए कुछ दूसरे प्रयोगों को अपनाना होगा। आपधारिक प्रवृत्तियों को रोकने के लिए रचनात्मक और सृजनात्मक विकास में संगीत का योगदान संभव है। मानवीय व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया में, जिसमें अनुशासन और कलाओं का अपना अलग महत्त्व है, संगीत का इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

शोधों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि संगीत के माध्यम से कई असाध्य रोगों का इलाज भी संभव हुआ है। अगर संगीत के जानकार होंगे तो चिकित्सा के क्षेत्र में भी उनका योगदान संभव हो सकेगा। संगीत साधना से बच्चों में मनुष्यता और संवेदना के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। कई बच्चे और युवा संगीत में रुचि रखते हैं, लेकिन सरकारी शिक्षण संस्थाओं में संगीत की शिक्षा की व्यवस्था नहीं है।

निजी संस्थाओं में संगीत की शिक्षा महंगी होने से गरीब और एक मध्यम वर्गीय के लिए यह संभव नहीं हो पाता। केंद्र और राज्य सरकारों को शिक्षा प्रणाली में सरकारी शिक्षण संस्थाओं में संगीत की शिक्षा को जरूरी करने पर विचार कर उचित संसाधन उपलब्ध कराना चाहिए।
’यशवंत गोरे, कुंजन नगर, भोपाल, मप्र

मूक की संवेदना

आज ऐतिहासिक पहलुओं से लेकर आधुनिक दौर के लोगों की निगहबानी करें तो हमें पशुओं के प्रति प्रेम और सद्भाव आदि का पता चलता है। ‘मूक के लिए संवेदना’ समझना आसान काम नहीं है। कोई भी हो वह पशुओं के बहाने मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करना चाहता है। महादेवी वर्मा के गिलहरी प्रेम ने उन्हें ‘गिल्लू’ लिखने के लिए न केवल प्रेरित किया, बल्कि समाज में जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम प्रसारित करने का कार्यभार भी सौंपा। हमारी सभ्यताएं ही हमारी धरोहर हैं।

इससे अलग मानव का जीवन यापन करने, कहीं न कहीं विखंडित जीवन का एक अंश है। उत्तराखंड की पहल नें समस्त पशु-पक्षियों, जलीय प्राणियों के लिए विधिक अस्तित्व सुनिश्चित किया जाना ‘दीर्घजीवी’ निर्णय है। कनाडा के हेलव जे मैकडोनाल्ड ने अपने संस्मरणात्मक अंदाज से पशुओं के प्रति प्रेम को उकेरा है।

जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम ने ‘यंग-इंडिया’ में अनेक लेख बापू से लिखवाए होंगे। कोरोना संकट इंसानों के साथ-साथ जानवरों पर भी ‘गुजरा’ है। हम सभी ने यह बखूबी महसूस किया होगा कि पशु-पक्षी मूक होते हुए भी ‘वाचाल’ हैं। जरूरत है, बस उनकी भाव-भंगिमाओ को समझने की।
’देवेश त्रिपाठी ‘राहुल’, संत कबीरनगर, उप्र

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