गणतंत्र का चेहरा - Jansatta
ताज़ा खबर
 

गणतंत्र का चेहरा

भारतीय गणतंत्र के सड़सठ वर्ष पूरे हो गए, राजपथ पर भव्य झांकियों और करतबों ने देश की एकता, अखंडता और समृद्धि को प्रतिबिंबित करने का भरपूर प्रयास किया।

Author नई दिल्ली | January 28, 2016 12:01 AM
गा हे तब जयगाथा : नई दिल्ली में मंगलवार को राजपथ पर 67वें गणतंत्र दिवस समारोह का नजारा।

भारतीय गणतंत्र के सड़सठ वर्ष पूरे हो गए, राजपथ पर भव्य झांकियों और करतबों ने देश की एकता, अखंडता और समृद्धि को प्रतिबिंबित करने का भरपूर प्रयास किया। पर क्या जिस देश का संविधान उसके नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, उसी गणतंत्र की प्रदर्शनी को देखने आए लोगों को विभिन्न श्रेणियों में बांटना अनुचित नहीं है? क्या वाकई संविधान निर्माण के सड़सठ वर्ष बाद भी देश के सभी नागरिकों को संविधान प्रदत्त सभी अधिकार प्राप्त हैं? शायद नहीं! आए दिन लोगों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करने की खबरें मिलती हैं।

हाल के दिनों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर काफी बहसें हुई हैं, जिसका कोई संतोषजनक परिणाम नहीं निकला। अभी यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि केरल और महाराष्ट्र के मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश निषेध का प्रकरण प्रकाश में आया। यह महिलाओं से लिंग आधारित भेदभाव का उदाहरण मात्र है। साथ ही हैदराबाद विश्वविद्यालय में जाति आधारित भेदभाव से पीड़ित दलित छात्र की आत्महत्या से समाज का दूषित या यों कहें कि असली चेहरा सामने आया है। संविधान में प्रदत्त एक भी अधिकार ऐसा नहीं है, जिसकी अवहेलना न होती हो। वर्ष में एक दिन भव्य झांकियां निकाल कर विश्वपटल पर भले खुद को गौरवशाली दिखाया जा सकता है, पर गणतंत्र की सफलता तब तक सिद्ध नहीं हो सकती जब तक समाज की कुरीतियों और भेदभाव को जड़ से खत्म नहीं कर दिया जाता। (उत्कर्ष सिंह, नई दिल्ली)
……………….

प्रदूषण पर पहरा
दिल्ली में सम-विषम योजना लागू करने का फैसला अब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जनता के हाथों में सौंप दिया है। दरअसल, जब सम-विषम योजना लागू हुई थी तब दिल्ली में प्रदूषण के स्तर में काफी सुधार हुआ और इसी के चलते यह नियम दुबारा लागू करने की बात हो रही है। यह कार्य प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। इस व्यवस्था से उम्मीद की जा रही है कि लोग प्रदूषण से मुक्त हो पाएंगे। लेकिन इस योजना से लोगों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ा था। सड़कों पर सम-विषम योजना से वाहनों की संख्या काफी कम हो गई थी और प्रदूषण में काफी राहत भी मिली है। लेकिन जनता की सहमति से अब यह नियम दुबारा लागू किया जाएगा। (सपना त्रिपाठी, ग्रेटर नोएडा)
………….

हिंदी से दूरी
इस बार के पद्मसम्मानों की सूची में देश की एक सौ बारह हस्तियां शामिल हैं। अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी प्रतिभाशाली और जानी-मानी हस्तियां! नामों का चयन सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के तहत होता है। इन नियमों का उल्लेख गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इस वर्ष चुनी गई हस्तियों में हिंदी के किसी रचनाकार का नाम न देख कर मन उदास हुआ। हिंदी के रथ पर सवार होकर वर्तमान सरकार ने शंखनाद किया था। देश के छह-सात राज्यों में बोली, लिखी और पढ़ाई जाने वाली हिंदी में से क्या चयन-समिति को एक भी कलम का धनी नजर नहीं आया? उसकी नजर तमिल, तेलुगू आदि भाषाओं के लेखकों पर तो गई, मगर हिंदी के नगीनों को छोड़ दिया। हिंदी में भाषणबाजी करना और हिंदी-हिंदी कहना एक बात है और हिंदी को सम्मान देना दूसरी बात। जब हिंदीपरस्त सरकार ही हिंदी के प्रति ऐसी बेरुखी दिखाए, तो दूसरी सरकारों से क्या आशा की जा सकती है! पिछले वर्षों की सूचियों को खंगाला जाए तो पाएंगे कि इनमें हिंदी का कोई-न-कोई लेखक-कवि अवश्य मौजूद रहा है।

हिंदी के लेखकों को शायद इसलिए छोड़ दिया गया होगा, क्योंकि वे निस्बतन ‘चूं-चूं’ अधिक करते हैं और सम्मान लौटाने की धमकी भी देते हैं। शायद इसीलिए उन्हें इस बार परे रखा गया। अन्यथा कोई कारण नहीं हो सकता कि हिंदी जगत से चयन कर्ताओं को कोई आला दर्जे के कलमकार का नामांकन न मिला हो। (शिबन कृष्ण रैणा, अलवर)
……………..

पानी की बर्बादी
राजस्थान में पानी की वैसे ही बहुत कमी है। पर किसान इस बात को नहीं समझते। एक को देख कर उसका पड़ोसी सोचता है कि मैं तो पानी बचा लूंगा, पर मेरा पड़ोसी मेरे बचाए पानी का सुख लेगा। भूजल स्तर नीचे तो वैसे भी जाएगा ही। किसान अपनी जरूरत पूरी करे तब तक तो ठीक है, पर उससे शौक पूरे करने लग जाए तो इससे भविष्य अंधकार में जाएगा ही।

इसकी जिम्मेदार बिजली कंपनियां हैं। उनको तय दर के बजाय उपभोग के अनुसार बिजली दरें रखनी चाहिए। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जरूरत वाली फसल तो हिसाब से बोई जाएगी और फिर बाकी खेत पर आमदनी लायक फसल बोई जाएगी। आजकल होता यह है कि किसी के पास चाहे दस बीघा जमीन हो या पचास, उसके पास भले श्रमशक्ति न हो, वह पूरी जमीन बो देता है। आमदनी थोड़ी-सी होती है और भूजल स्तर तेजी से नीचे गिरता है। सरकार को बिजली के पैसे घरेलू उपभोक्ताओं से वसूलने पड़ते हैं। बिजली महंगी होने से लोग व्यवसाय करने से पहले तीन बार सोचते हैं। व्यवस्था में गड़बड़ी की वजह से सबके सब दुखी हैं, विकास तो रुक ही रहा है। (राजा सिंह रेपसवाल, जयपुर)
……………..

कुदरत का कहर
विज्ञान ने प्रकृति पर नियंत्रण पाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह आंशिक रूप से सफल नहीं हो सका। उसने चांद तक का सफर तय कर लिया और बहुत-सी खोजें कर लीं, लेकिन प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों और उसके प्रकोपों को नहीं रोक सका। इतनी प्रगति के बाद भी प्रकृति पहेली बनी हुई है। दुनिया के सभी देशों में प्रकृति ने सुनामी, बाढ़, सूखा, भूकम्प, बर्फबारी आदि के माध्यम से अपना गुस्सा जाहिर किया है। इससे जान-माल की भारी हानि होती है।

इस समय चीन, अमेरिका और जापान में प्रकृति ने कहर ढाया है। अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में बर्फ का कहर दिख रहा है। वहां के दस शहरों में रेड अलर्ट जारी किया जा चुका है। पांच राज्यों में आपातकाल लगाया जा चुका है। इस बार समस्या इतनी गंभीर होती जा रही है कि सुपर मार्केट में खाने का सामान खत्म हो चुका है। दुनिया को अपने आगे नतमस्तक करने वाला देश अमेरिका आज प्रकृति के सामने लाचार नजर आ रहा है। आखिर प्रकृति से कौन जीत सका है!
(प्रखर वार्ष्णेय, गाजियाबाद)

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App