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मजहब नहीं सिखाता

मालदा की घटना कोई छोटा मुद्दा नहीं है। कट्टर सोच वाले मुसलमानों को अब मंथन करने की जरूरत है। पैगंबर साहब के बारे में कहने-सुनने से ज्यादा उनकी बातों पर अमल करने की जरूरत है..
Author नई दिल्ली | January 12, 2016 21:37 pm
यह तस्‍वीर 3 जनवरी 2016 की है। जब उग्र भीड़ ने पश्चिम बंगाल के कालियाचक में दर्जनों वाहन समेत पुलिस स्‍टेशन को आग लगा दी थी।

ये वही धर्मगुरु हैं जो जुमे की नमाज में तकरीर करते वक्त इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद की अहिंसा की विचारधारा की खूबसूरती को बयां करते हैं। ये वही लोग हैं जो बताते हैं कि मोहम्मद साहब पर जो औरत कूड़ा फेंक कर जाती थी, जब वह बीमार पड़ी तो उसके ठीक होने के लिए मोहम्मद साहब ने दुआ की। ये लोग बताते हैं कि मोहम्मद साहब ने जंग करने के लिए भी कई तरह के कानून बनाए थे। पैगंबर ने जंग के वक्तकुदरत को नुकसान न पहुंचाने, आत्मसमर्पण करने वालों को न मारने, किसी का घर न लूटने और बंधकों से इंसानी तरीके से पेश आने को कहा था। इन तमाम बातों को ये लोग अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन ऐसे वक्त में अपने होंठ सी कर बैठ जाते हैं।

कुछ गिने-चुने लोग हैं जो ऐसे मामलों की निंदा करते हैं, लेकिन तादाद कम होने की वजह से उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता। इसके अलावा दो लाख से ज्यादा की तादाद में लोगों का सड़कों पर उतर आना, अपने आप बताता है कि उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों की पिच तैयार हो रही है। ध्रुवीकरण की राजनीति अब धीरे-धीरे जोर पकड़ना शुरू कर देगी।

असल में, सड़कों पर उतारने वालों से ज्यादा जिम्मेवार वे लोग हैं जो बिना सोचे-समझे हंगामा करने निकल पड़ते हैं। गलती इन लोगों की भी उतनी ही बड़ी है। ये लोग सच्चर कमेटी को तो याद रखेंगे और कहेंगे कि मुसलमान आर्थिक और खास कर शैक्षणिक तौर पर बहुत पिछड़ा है, लेकिन शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर कोई आंदोलन करने के लिए शायद ही कभी सड़कों पर उतरें।

रही बात मुसलमानों के तथाकथित रहनुमाओं की, तो उन्हें भी इन मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं। मालदा की घटना कोई छोटा मुद्दा नहीं है। कट्टर सोच वाले मुसलमानों को अब मंथन करने की जरूरत है। पैगंबर साहब के बारे में कहने-सुनने से ज्यादा उनकी बातों पर अमल करने की जरूरत है। धर्म के खिलाफ किसी के कुछ कह देने पर ज्यादा सक्रियता दिखाने से बेहतर होगा कि जरूरी मुद्दों पर सक्रियता दिखाई जाए।

कमलेश तिवारी के कुछ कह देने से इस्लाम खतरे में नहीं पड़ता, हां उसके जवाब में अनवारुल हक जो कहता है, उससे इस्लाम खतरे में जरूर पड़ता है! (नदीम अनवर, लक्ष्मी नगर, दिल्ली)
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नापाक मंसूबे
बार-बार धोखा खाने के बावजूद हम पाकिस्तान से रिश्ते मजबूत या बेहतर करने की कोशिश करते रहते हैं जबकि यह पाकिस्तान की भी जिम्मेदारी है कि अपनी सीमा से लगातार हो रही आतंकवादियों की घुसपैठ जैसी गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगाए। न जाने और कितने बलिदानों के बाद भारत सरकार समझ पाएगी कि पीठ में छुरा घोंपना पाकिस्तान की पुरानी आदत है। आतंकवादी आए दिन हमारी सीमा में घुस कर हमला कर देते हैं जिसमें न केवल सैनिक शहीद हो जाते हैं बल्कि मासूम आम लोग भी मारे जाते हैं। सैनिकों के परिवारों को तो थोड़ी-बहुत सरकारी मदद मिल जाती है पर उन आम नागरिकों के परिवारों का क्या होता होगा जिनकी बैसाखी ही टूट जाती है। सवाल है कि यह सब कब तक चलता रहेगा? (वासु चौरे, करेली, नरसिंहपुर)
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घातक सियासत
पश्चिम बंगाल के मालदा जो हुआ उसे एक समुदाय की स्वत: स्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता। यह संभव नहीं है कि किसी ऐसे नेता के बयान से हजारों लोग भड़क जाएं, जो जाना-पहचाना नाम नहीं है। वह भी तब जबकि वह कथित बयान किसी दूर के प्रदेश में दिया गया हो। लेकिन ऐसा ही हुआ। उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में भी कुछ जगहों पर प्रदर्शन हुए हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसका संबंध विधानसभा चुनाव से है। ऐसी घटना पर पुलिस की कार्रवाई नाकाफी रही तो इससे सवाल उठता है कि क्या पुलिस राज्य में सत्ताधारी दल के हितों को ध्यान रखते हुए काम कर रही है? कथित भड़काऊ बयानों को लेकर शांति व्यवस्था भंग करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। (शुभम सोनी, इछावर मध्यप्रदेश)
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जस का तस
सच्चे देशप्रेमी अपने देश की बड़ाई ही करते हैं, अवमानना नहीं। अवमानना वे करते हैं जिनका देशप्रेम संशयग्रस्त होता है। इसी तरह राजदूत भी अपने देश के प्रतिनिधि होते हैं। अपने देश की हर तरह से बड़ाई करना उनका धर्म बनता है। ‘अतुल्य भारत’ के ब्रांड एम्बेसडर को अगर ‘असहिष्णुता’ वाली टिप्पणी पर लोगों ने आड़े हाथों लिया तो इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं लगता।
वैसे सवाल यह भी है कि पहले जो ब्रांड एम्बेसडर बनाए गए थे उनसे ही देश ने कौन-सी स्वर्ग तक छलांग लगाई? सब कुछ जस का तस है। न महंगाई कम हुई और न सांप्रदायिक उन्माद में कोई कमी आई है। इस समय देश के सामने अंदर और बाहर कई तरह की चुनौतियां हैं, पहले सरकार उनसे निपटे। ‘ब्रांड एम्बेसडर’ बाद में नियुक्त होते रहेंगे। (शिबन कृष्ण रैणा, अलवर)
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बेतुके बयान
कांग्रेस नेता मनीष तिवारी के बयान पर विवाद उठा तो उनकी पार्टी ने पल्ला झाड़ लिया। इससे पहले कई अन्य पार्टियां अपने नेताओं के ऊलजलूल बयानों से किनारा कर चुकी हैं। लिहाजा, अब समय आ गया है कि नेताओं के बेतुके बयानों पर लगाम लगाने के लिए हर राजनीतिक पार्टी का आलाकमान गंभीरता से विचार करते हुए विशेष कदम उठाए। इन दिनों हर पार्टी में बेतुके बयान-बाजीगरों की संख्या बढ़ती जा रही है। इससे पार्टी का तो नुकसान हो ही रहा है, देश की छवि को भी धक्का लग रहा है। यदि नेता ही ऊटपटांग बयानबाजी करने से नहीं चूक रहे हैं तो वे कैसे देश और देश की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभा पाएंगे? इस पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए कि केवल अपने अधीनस्थ नेताओं की ऊटपटांग बयानबाजी से पार्टियों के पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलेगा, इस पर देशहित में अंकुश लगना जरूरी है। (महेश नेनावा, गिरधर नगर, इंदौर)

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  1. S
    suresh k
    Jan 12, 2016 at 10:40 pm
    मालदा की भीड़ आतंकारी , अपराधी. गुंडो की थी , ममता सरकार का इन्हे वोटो के कारन समर्थन था ,
    (0)(0)
    Reply