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चौपाल: तकनीक बनाम मनुष्य

पिछले दिनों दिल्ली में चालकरहित मेट्रो का उद्घाटन हुआ। भारत की यह पहली मेट्रो होगी, जो बिना ड्राइवर के चलेगी। लेकिन क्या हकीकत में हमें चालकरहित मेट्रो की अभी जरूरत है?

सांकेतिक फाेटो।

क्या मेट्रो का चालकरहित होना हमारी जिंदगी में कोई प्रत्यक्ष बदलाव ला सकता है? वह भी ऐसे समय में, जब भारत जैसा देश कोरोना विषाणु के साथ-साथ सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर का सामना कर रहा है।

आज सीएमआइई के अनुसार, भारत का बेरोजगारी स्तर दस फीसद तक पहुंचने वाला है, जिसमें शहरी क्षेत्रों में 9.0 प्रतिशत बेरोजगारी दर दर्ज की गई है और ग्रामीण क्षेत्रों में 9.1 प्रतिशत। पिछले महीने सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर हरियाणा (25.6) और राजस्थान (18.6) प्रतिशत रहा। ये आंकड़े किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं हैं।

हमारी सरकार देश को रोजगार देने वाले क्षेत्रों में नई-नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर, मेट्रो को चालकरहित बना कर लोगों को बेरोजगार करने पर तुली है। तकनीकी एक अच्छी चीज है अगर उसका उपयोग मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने में किया जाए, न कि उससे जीवन को बेहतर बनाने के मौके छीनने के लिए।

अगर हमारे देश में जनसंख्या अधिक हो रही है तो सरकारों को अलग-अलग क्षेत्रों में रोजगार देने के बार में सोचना चाहिए, न कि उन क्षेत्रों से रोजगार को खत्म कर देना चाहिए। जिन क्षेत्रों से लोगों का अच्छी नौकरी और भत्ता मिलता हो, ऐसे और भी कदम भविष्य में उठाए जाएंगे। लेकिन क्या भारत जैसे बहुसंख्यक देश में ये सब जरूरी होगा, जहां हमें लोगों को रोजगार देना चाहिए, वहीं हम उनसे उनका रोजगार खत्म करने से उपजने वाली भावी त्रासदी को नजरअंदाज कर रहे हैं।

सरकारों से जनता की उम्मीद यही होगी कि लोगों को रोजगार मिलने वाली परियोजनाओं पर कार्य किया जाए। वैसे भी सरकार ने सरकारी नौकियां कम कर दी हैं और नई भर्तियों पर रोक लग रही है। इस पर नई-नई प्रौद्योगिकी पर धन खर्च करके लोगों की जिंदगी और मुश्किल में न डाला जाए।
’जितिन कुमार, आंबेडकर नगर, नई दिल्ली

विकल्प का पाठ

हर वर्ष के तरह यह वर्ष भी गुजरने की कगार पर है। 2020 में कई चुनौतियों ने हमें घेरा, पर खासकर शिक्षा क्षेत्र तो इस कोरोना काल में बुरी तरह प्रभावित हुआ। कई छोटे बच्चे साधारण गणित की गणना तक भूल गए। वहीं बड़े बच्चों की समय सारणी पर भी इसका बुरा असर पड़ा।

सरकारी आंकड़ों की ही बात करें तो एक चौथाई से ज्यादा बच्चों के पास आॅनलाइन पढ़ाई करने के लिए या तो डिजिटल उपकरण नहीं हैं या इंटरनेट तक पहुंच नहीं है। इस प्रकार न चाहते हुए भी कई बच्चे अपने मौलिक अधिकार से वंचित रह गए।

नवोदय जैसी संस्था जो विशेष तौर पर आर्थिक-सामाजिक और क्षेत्रीय रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए बना था, वहां भी आॅनलाइन कक्षा में विद्यार्थियों की कम उपस्थिति ने इस वर्ष निराश किया। अगले साल यानी 2021 की भी सबसे बड़ी चुनौती यही होगी की बच्चे फिर से स्कूल पहुचें और स्कूल विद्यार्थियों के नुकसान की भरपाई योग्य शिक्षकों के सामर्थ्य से करे।
’आशीष कुमार गुप्ता, गिधौर, जमुई, बिहार

अमूर्तन के दावे

एक जानकारी के मुताबिक वैज्ञानिक जेक टर्नर के ने बताया है कि शोध कर रहे वैज्ञानिकों को एलियन अपनी ओर से संकेत भेज रहे हैं। बूट्स सिस्टम में मिल रहे ये रेडियो संकेत ग्रह की चुंबकीय क्षेत्र की ताकत और ध्रुवीकरण की वजह से प्राप्त होने की बात कही गई है।

ताऊ बूट्स नाम के तारे की प्रणाली इक्यावन प्रकाश वर्ष दूर है। विदेशों में एलियन, उड़न तश्तरियों को देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में एलियन के शैल चित्र आज भी देखे जा सकते हैं। अमेरिका के एक प्रतिबंधित क्षेत्र में भी एलियन और उस उड़न तश्तरी की खबरें सुर्खियों में रही थी, जो पृथ्वी पर आने से दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी।

एलियनों पर काल्पनिक फिल्मों का भी निर्माण हुआ है। इन दावों की हकीकत अभी साबित नहीं हो पाई है, इसलिए फिलहाल अभी इसे चर्चा का विषय ही मानना चाहिए। लेकिन यह सच है कि फिलहाल दूसरे ग्रहों पर बस्ती, पानी आदि की खोज जारी है तो आने वाले वक्त में खोजे गए रेडियो संकेतों के भी राज खुल सकेंगे।
’संजय वर्मा ‘दृष्टि’, मनावर, धार, मप्र

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