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चौपालः प्रदूषण के स्रोत

लेकिन सरकार प्लास्टिक बनाने के उपक्रमों पर कड़े प्रतिबंध तो लगा नहीं रही है और प्लास्टिक मुक्त भारत का नारा दे रही है।

Author June 18, 2018 4:53 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रदूषण के स्रोत

पर्यावरण दिवस के कुछ पहले और बाद के कुछ दिनों तक लगातार लगभग सभी मंचों पर पर्यावरण को बचाने और उसमें भी प्लास्टिक को हटाने संबंधी तमाम विचार प्रकट किए जाते हैं। यह हर साल होता है और इसमें जाहिर किए गए विचार सही भी होते हैं। लेकिन बिना जनभागीदारी के प्लास्टिक रूपी भयानक दुश्मन को खत्म कर पाना असंभव है। लेकिन क्या ऐसा कोई हल नहीं है जो इसके जड़ को खत्म कर दे। संतोष उत्सुक के लेख ‘खतरे की थैली’ (11 जून) में लिखीं ये पंक्तियां इस तरह के हल की ओर इशारा करती हैं- ‘जब देश में पॉलीथिन बनाने की नित नई इकाइयां लगाई जा रही हैं, उत्पादन और प्रयोग बढ़ता जा रहा है तो पाबंदी कितनी कारगर होगी!’ मतलब स्पष्ट है कि जब तक प्लास्टिक-पॉलीथिन बनता रहेगा, तब तक कोई भी कानून इस पर पाबंदी लगाने के मामले में पूर्ण विजय प्राप्त नहीं कर सकता।

लेकिन सरकार प्लास्टिक बनाने के उपक्रमों पर कड़े प्रतिबंध तो लगा नहीं रही है और प्लास्टिक मुक्त भारत का नारा दे रही है। जब उत्पादन हो रहा है तो उसका उपभोग तो होगा ही। ये भी ठीक है कि लोग प्लास्टिक का उपयोग ही न करें तो अपने आप ही ये उपक्रम बंद हो जाएंगे। लेकिन एक सौ तीस करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश का हरेक नागरिक ईमानदारी से ऐसा कर पाएगा, यह सोचना खामखयाली है। इसलिए इसके उत्पादन को ही रोकने की जरूरत है।

अंकित रजक, बिल्हारी-दतिया, मध्यप्रदेश

बेरोजगारी का दंश

देश के सभी राज्य सरकारों के नौकरियों को अगर मिला दिया जाए तो उनकी संख्या पांच लाख को पार नहीं करेगी। देश में हर महीने इस संख्या से कहीं अधिक नए युवा रोजगार के लाइन में खड़े हो रहे हैं। ये लाइन इतनी लम्बी हो चुकी है कि स्थिति दिन पर दिन भयावह होती जा रही है। ऐसे में विभिन्न राज्य सरकारें दिखावे के लिए अपनी सरकारी नौकरियों की उम्र सीमा को बढ़ाने का आदेश देना शुरू कर दिया। ताकि बेरोजगारों को संकेत दिया जा सके कि वे इनका कितना खयाल रख रही हैं।
जबकि ऐसा कुछ है नहीं। ग्रुप सी और डी के ज्यादातर पद को ठेकेदारी प्रथा के सुपुर्द कर दिया गया है। असुरक्षित रोजगार लोगों की जीवन शैली को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। लेकिन अब जनता नेताओं के इस राजनीतिक हथकंडे को अच्छी तरह से समझ गई है।

जंगबहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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