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चौपाल: विज्ञान की चेतना

हमारी वैज्ञानिक चेतना का स्तर क्या है ? इस सवाल का जवाब वे माता-पिता देते नजर आते हैं जो टीवी चैनलों में अक्सर यह पूछते नजर आते हैं कि उनके बीएससी-एमएससी पास या पीएचडी धारी बेटे-बेटी को नौकरी कब मिलेगी। कई बार तो ये विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त युवक-युवतियां खुद ही प्रश्नकर्ता होते हैं।

Author Published on: November 12, 2018 3:22 AM
प्रतीकात्मक फोटो

हमारी वैज्ञानिक चेतना का स्तर क्या है ? इस सवाल का जवाब वे माता-पिता देते नजर आते हैं जो टीवी चैनलों में अक्सर यह पूछते नजर आते हैं कि उनके बीएससी-एमएससी पास या पीएचडी धारी बेटे-बेटी को नौकरी कब मिलेगी। कई बार तो ये विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त युवक-युवतियां खुद ही प्रश्नकर्ता होते हैं। यह हमारी दिमागी सीमा का द्योतक है कि लोग आज भी तांत्रिकों पर भरोसा करते हैं और उन पाखंडियों के लिए आराम की जिंदगी बिताने का सामान मुहैया करते रहते हैं, जिन्हें रोटी कमाने के लिए अन्यथा जीतोड़ मेहनत करनी पड़ती। अगर किसी समाज में गुंडागर्दी पर अंकुश नहीं लगता तो हम पुलिस को कोसते हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो समाज में व्याप्त अंधविश्वासों पर अंकुश न लगने के लिए वे लोग जिम्मेदार हैं, जिनके ऊपर जवाहरलाल नेहरू ने कभी वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जिम्मेदारी डाली थी। नेहरू का सपना था कि भारतीय वैज्ञानिक अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जो अंधविश्वासों और रूढ़िवादी विचारों से मुक्त होगा। नेहरू वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं को आधुनिक भारत के नए तीर्थस्थल मानते थे।

यह खेद की बात है कि हमारे वैज्ञानिकों ने कभी भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि समाज में व्याप्त अंधविश्वासों को कैसे दूर किया जा सकता है। उल्टे कई वैज्ञानिक खुद ही इन अंधविश्वासों में फंसे नजर आते हैं। इसका संबंध कहीं न कहीं भाषा से भी जुड़ा हुआ है। हमारे वैज्ञानिक ‘तीर्थस्थलों’ में बैठे लोग अपनी बात कहने के लिए अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं, जिसे वे लोग समझ नहीं पाते हैं, जिन्हें तांत्रिक और बाबा अपने जाल में फंसाते हैं। अगर हमारे वैज्ञानिक जनता के बीच जाकर अपनी बात स्थानीय बोली-भाषा में कहेंगे तो इस बढ़ते हुए ‘मानसिक भ्रष्टाचार’ पर काबू पाया जा सकता है। जब हम सामने मौजूद व्यक्ति से वैज्ञानिक चेतना या दृष्टिकोण की अपेक्षा करते हैं तो उसका अर्थ यह कतई नहीं है कि हम उससे भौतिकी, रसायन या दूसरे वैज्ञानिक विषयों से संबंधित उन बातों को सुनना चाहते हैं, जिन्हें इन विषयों में डिग्री हासिल करने के लिए याद करना पड़ता है। सच यह है कि एक उच्चतम स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद कई लोग अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोगों से भी अधिक दकियानूसी होते हैं। परेशानी की सबसे बड़ी बात है कि हमारे मनोवैज्ञानिक अभी तक कोई ऐसा पैमाना तैयार नहीं कर पाए हैं जो यह बता सके कि व्यक्ति विशेष की ‘वैज्ञानिक सोच’ का स्तर क्या है?

वैज्ञानिक चेतना पर भाषण देने वाले और इसके प्रचार-प्रसार में रुचि रखने वाले कई लोग खुद वक्त-बेवक्त ऐसे कार्य करते मिल जाएंगे, जिनसे रूढ़िवाद को बढ़ावा मिलता है और समाज, देश और दुनिया को नुकसान होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति जो भी कार्य करता है, उससे समाज, देश और विश्व का हित होता है, मानव सहित सभी जीव-जंतुओं को लाभ पहुंचता है और आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर भविष्य के निर्माण में मदद मिलती है।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका

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