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चौपाल: जानलेवा रोग

समय रहते कैंसर की जांच और उसके निदान के प्रति लोगों को प्रेरित और जागरूक करने लिए अक्सर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। लोगों को इस जानलेवा बीमारी के प्रति जागरूक बनाने के लिए 1975 में राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कैंसर से मरने वालों की दर काफी चिंताजनक हो चुकी है।

Author Published on: November 12, 2018 3:29 AM
प्रतीकात्मक फोटो

समय रहते कैंसर की जांच और उसके निदान के प्रति लोगों को प्रेरित और जागरूक करने लिए अक्सर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। लोगों को इस जानलेवा बीमारी के प्रति जागरूक बनाने के लिए 1975 में राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कैंसर से मरने वालों की दर काफी चिंताजनक हो चुकी है। वर्तमान में भारत में प्रतिवर्ष होने वाली मौतों के लिए दूसरा सबसे बड़ा कारण कैंसर माना जा रहा है। अगर समय रहते हालात पर नियंत्रण नहीं किया किया गया तो इस सदी के अंत तक स्थिति और अधिक खराब होने की संभावना विशेषज्ञों द्वारा जताई जा रही है। किसी व्यक्ति के शरीर में कैंसर उत्पन्न होने के विभिन्न कारण होते हैं, जिसमें खानपान से संबंधित अनियमितता प्रमुख है।

आज लोग अनियमित दिनचर्या के चलते नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। इन पदार्थों में निकोटिन से युक्त नशीले पदार्थ प्रमुखता से उपयोग किए जाते हैं। विभिन्न आय और आयु वर्ग के लोग अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार जानते-बूझते तंबाकू युक्त पदार्थों का सेवन करके विभिन्न प्रकार के कैंसर का शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा, अनजाने में कैंसर के शिकार होने के पीछे मिलावट युक्त खाद्य पदार्थ होते हैं। ऐसे हालात में व्यापक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए ही लोगों को कैंसर से बचाया जा सकता है। जाने-अनजाने शिकार हुए लोगों को समय रहते जांच के लिए प्रेरित करना होगा, ताकि प्रारंभिक चरण में संसूचित होने बाद समुचित इलाज से मरीज की जान बचाई जा सके। सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि सरकारी मशीनरी द्वारा मिलावटी खाद्य पदार्थों पर सख्ती से लगाए।
’ऋषभ देव पांडेय, सूरजपुर, छत्तीसगढ़

लोकतंत्र के सामने
वर्तमान समय में जिस हिसाब से लोकतंत्र के स्तंभ कहे जाने निकायों में अपनी सुविधा के मुताबिक नियुक्तियां की जा रहीं हैं, संस्थाओं को मनमाना स्वरूप दिया जा रहा है, उससे आने वाले दिनों की झलक मिल जाती है कि हमारा लोकतंत्र क्या शक्ल लेगा। कई स्वायत्त संस्थाओं की स्वायत्तता और उनकी संसदीय परंपरा की धार को कुंद किया जा रहा है। दुखद यह है कि आपातकाल में लोकतांत्रिक संस्थानों का जितना गला घोंटा गया था, देश को उसी ओर झोंका जा रहा है। देश को 2019 के चुनावों से पहले एक बार फिर निरर्थक मुद्दों जैसे मंदिर निर्माण और राम की सबसे ऊंची मूर्ति बनाने की घोषणाओं में उलझाया जा रहा है। अदालत तक के सामने चुनौती पेश की जा रही है। सवाल है कि इन सबसे लोकतंत्र कितना मजबूत होगा? देश की बुनियादी समस्याओं पर बातें बंद हो गई हैं, समाधान के रास्ते छिन्न-भिन्न हो गए हैं, चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, रोजगार हो, स्वास्थ्य, खेती, महंगाई, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, भुखमरी या फिर कुपोषण हो, सभी समस्याएं नेपथ्य में चली गई हैं। कुछ लोग विरोध कर भी कर रहे हैं तो उन्हें भ्रमित करने वाले आरोपों के कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। 2019 का चुनाव इस देश, यहां के आम लोगों, लोकतंत्र को बचाने वाले स्तंभों के लिए बेहद जरूरी बात है। इसलिए लोकतांत्रिक शक्तियों और अन्य राजनीतिक दलों को अपने-अपने अहं, पद के लालच और व्यर्थ के मतभेदों को भुला कर मैदान में उतरना चाहिए। लोकतंत्र और देश को बचाना सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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