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चौपालः किसका आधार

आरक्षण की मांग जब आंदोलन का रूप ले लेती है तो राष्ट्रीय संपत्ति का बहुत नुकसान होता है। हमेशा इसका आकलन भी नहीं हो पाता है।

Author August 1, 2018 3:13 AM
प्रतीकात्मक चित्र

किसका आधार

आधार कार्ड पर छपा होता है: आम आदमी का आधार। आधार अगर आम आदमी के लिए है तो विशेष व्यक्ति के लिए क्या है? आधार तो आजकल विशेष आदमी के लिए भी अनिवार्य-सा हो गया है। अमूमन हर विशेष आदमी आम आदमी को गरीब समझता है। आधार कार्ड पर लिखे संदेश से लगता है कि यह गरीबों के लिए है। ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, पैन कार्ड, बैंक पास बुक, राशन कार्ड, वोटर कार्ड आदि पर आम आदमी के बारे में नहीं छपा होता। लिहाजा, आधार कार्ड से ‘आम आदमी का आधार’ को हटा कर ‘विशेष पहचान कार्ड’ लिखा जा सकता है।

जीवन मित्तल, मोती नगर, नई दिल्ली

आंदोलन के बजाय

आरक्षण की मांग जब आंदोलन का रूप ले लेती है तो राष्ट्रीय संपत्ति का बहुत नुकसान होता है। हमेशा इसका आकलन भी नहीं हो पाता है। यह देश इतना बड़ा और विविधता वाला है कि जहां एक ओर कोई आरक्षण खोना नहीं चाहता है तो दूसरी ओर कुछ लोग आरक्षण के सहारे अपने विकास के दरवाजे खोलना चाहते हैं। आरक्षण रहे अथवा नहीं रहे, मिले या नहीं मिले, नए लोग शामिल हों या न हों, उसका प्रतिशत 50 हो या शत प्रतिशत जो भी हो, इस मसले पर सत्ता पक्ष अथवा विपक्ष राजनीति न कर देशहित के बारे में सोचें और क्षेत्रीय या जातिगत स्वार्थ से ऊपर उठ कर राष्ट्रीय भावना के साथ आरक्षण संबंधी कोई निर्णय लें। हमारा देश लोकतांत्रिक है, जियो और जीने दो हमारी संस्कृति है। आरक्षण के लिए सड़कों पर उतरने के बजाय अपने-अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि के माध्यम से दबाव बनाने की आवश्यकता है। आरक्षण की आग में झुलस कर व्यक्तिगत अथवा सार्वजनिक नुकसान हो यह कतई अच्छी बात नहीं है।

मिथिलेश कुमार, भागलपुर

तब तक

सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग (भीड़ की हिंसा) की घटनाएं रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हंै। उसने चार हफ्तों में केंद्र और राज्यों को इन्हें लागू करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि कोई नागरिक अपने हाथ में कानून नहीं ले सकता है, यह राज्य सरकारों का फर्ज है कि कानून व्यवस्था बनाए रखें। ‘इंडिया स्पेंड’ के विश्लेषण के अनुसार सोशल मीडिया पर बच्चा चोरी की अफवाह के चलते पिछले 18 महीनों में 66 बार भीड़ हमलावार हुई है और 33 लोगों की जान गई। पिछले आठ सालों में गोरक्षा को नाम पर 33 लोगों की मौत हुई है। ये आकड़े दर्शाते हैं कि भीड़तंत्र देश और समाज के लिए बड़ा खतरा पैदा करने लगा है। इन हमलों के पीछे सोशल मीडिया की अहम भूमिका होती है। उसके जारिए भड़काऊ बयान, संदेश, फर्जी वीडियो व खबरों को फैलाया जाता है जिनसे भीड़ के भड़कने की आशंका रहती है।

गोरक्षकों के हमले में मारे गए अखलाक से लेकर पहलू खान तक को इंसाफ नहीं मिला है। अलवर में पहलू खान की हत्या के पांच आरोपियों का तुलना भगत सिंह से की जाती है। अखलाक की हत्या के सारे आरोपी बाहर हैं। गोरक्षा के मामले में पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार भी किया उनमें से ज्यादातर जमानत पर हैं। जब तक इन आरोपियों को सत्ता पक्ष का संरक्षण मिलता रहेगा, तब तक मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर रोक नहीं लग सकती है।

महेश कुमार यादव, दिल्ली

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