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चौपालः संत-पथ

देशभर में कबीर जयंती धूमधाम से मनाई गई। सवाल है कि क्या जयंती मना लेने मात्र से हमारे कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है? असल में, संत-महात्मा अपने आचरण और वाणी से जो सीख देते हैं, उसे आत्मसात करना ही उनके प्रति सच्चा प्रेम है।

Author July 3, 2018 04:25 am
देशभर में कबीर जयंती धूमधाम से मनाई गई। सवाल है कि क्या जयंती मना लेने मात्र से हमारे कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है?

देशभर में कबीर जयंती धूमधाम से मनाई गई। सवाल है कि क्या जयंती मना लेने मात्र से हमारे कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है? असल में, संत-महात्मा अपने आचरण और वाणी से जो सीख देते हैं, उसे आत्मसात करना ही उनके प्रति सच्चा प्रेम है। आज भी समाज में चारों ओर जात-पात, अंधश्रद्धा व सांप्रदायिक उन्माद का बोलबाला है। धार्मिक पाखंड, अन्याय, आतंकवाद, अराजकता का आलम है। क्या राष्ट्र ऐसी घातक बुराइयों से उबर पाया है? बिल्कुल नहीं। तो फिर साधु-संतों व अन्य महापुरुषों के जन्मदिवस मनाने का क्या औचित्य है? क्यों हमने अपने जीवन और परिवेश में तुच्छ विचारों व चिंताओं का मकड़जाल बुन रखा है? क्यों न संत-पथ पर चल कर आप भी सुखी हों और दूसरों का जीवन भी सुखी बनाएं।

नीरज मानिकटाहला, यमुनानगर, हरियाणा

महिला असुरक्षा

हमारे तमाम राजनीतिक दल सत्ता में आने से पहले किसानों, महिलाओं, मजदूरों, दलितों आदि के कल्याण की खूब बातें करते रहते हैं लेकिन फिर भी समाज में उनकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। हाल में थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन की रिपोर्ट में भारत को महिला असुरक्षा के मामले में शीर्ष से चौथा स्थान दिया गया। हालांकि इसकी प्रामाणिकता पर कुछ लोगों ने सवाल भी खड़े किए लेकिन महिला सुरक्षा के मामले में जो वर्तमान स्थिति है उससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है।

कठुआ और मंदसौर में बच्च्यिों के साथ दुराचार जैसी जघन्य वारदातें अभिभावकों में भय उत्पन्न करती हैं। यह भय उन्हें अपनी बेटियों को अकेले बाहर पढ़ने के लिए भेजने, नौकरी करने, बाह्य आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने देने से हतोत्साहित करता है। इससे महिलाओं का विकास रुकता है और उनकी सुरक्षा के दावे झूठे प्रतीत होते हैं। सरकारों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि महिला सुरक्षा महिला सशक्तीकरण की अनिवार्य शर्त है। सरकार को महिला सुरक्षा के मामले में गंभीरता से कार्य करना चाहिए।

अभिजीत केशरी, सहारनपुर

अच्छी शिक्षा

किसी भी देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति उसकी शिक्षा पर निर्भर करती है। अच्छी शिक्षा के बगैर बेहतर भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। अगर देश की शिक्षा अच्छी है तो उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन आज देखा जा है कि हम ज्यादा महत्त्व विद्यालय को न देकर कोचिंग संस्थानों को दे रहे हैं जिनका मुख्य काम धन अर्जित करना होता है। बच्चों में कोचिंग जाना एक फैशन हो गया है। कोचिंग संस्थानों में भले शिक्षा मिल जाती हो, पर नैतिक शिक्षा वहां न के बराबर मिलती है। जो आदर एक विद्यालय के शिक्षक को दिया जाता है वैसा आदर पाने की कोशिश कोचिंग संस्थान के शिक्षक नहीं करते। विद्यार्थी जीवन में हमें जो सिखाया जाता है वही हमें जिंदगी भर काम आता है। इसलिए कोचिंग संस्थान की ओर न भाग कर विद्यालयों पर ज्यादा विश्वास रखना चाहिए।

निलेश मेहरा, दिल्ली

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