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चौपालः ‘बेरोजगारी का अंधेरा’, ‘हाशिये पर जनता’ और ‘सेहत का पायदान’

लांसेट पत्रिका ने वैश्विक स्वास्थ्य सूचकांक जारी की है, जिसमें हमारे देश में लोगों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था की दृष्टि से एक चिंताजनक तस्वीर है।

Author June 6, 2018 4:12 AM
(Fe Photo)

बेरोजगारी का अंधेरा

राजग के घोषणा-पत्र में दस करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया गया था, लेकिन चार साल बाद आधे लोगों को भी नौकरी नहीं मिल पाई है। उल्टा बेरोजगारी की समस्या बढ़ रही है। बेरोजगारों का आंकड़ा कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। सरकार के कार्यकाल का यह अंतिम और चुनावी वर्ष है। ऐसे में पिछली सरकारों की नीतियों की कोसने से बेरोजगारों का पेट भरने वाला नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक करीब बारह से तेरह करोड़ लोग बेरोजगार हैं, वहीं 2015 में सिर्फ एक लाख पैंतीस हजार लोगों को ही नौकरी मिली थी।

अब बेरोजगारों को रोजगार के लिए कड़ी धूप में सरकारी दफ्तरों के सामने आंदोलन, धरना, प्रदर्शन करना पड़ता है, लेकिन सरकार रोजगार देने की बजाय पुलिस से लाठी चार्ज कराती है। राजनीतिक कारणों से आंदोलन को दबाने के लिए होशियार विद्यार्थियों-युवाओं पर मुकदमे कर दिए जाते हैं और उसके बाद उसकी जिंदगी में सरकारी नौकरी सपना ही रह जाती है। आज बेरोजगारी की दर पांच साल के उच्चतम स्तर पर है। सरकार के मंत्री भी बेरोजगारी की समस्या को स्वीकार करते हैं और लंबे समय को ध्यान में रखते हुए समाधान की बात करते हैं। लेकिन त्वरित समाधान निकालना होगा, क्योंकि बेरोजगार नौजवानों की उम्र बढ़ती जा रही है। ऐसे में युवाओं के सामने अवसर भी सीमित है।

महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

हाशिये पर जनता

हाल ही में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरह की जोड़-तोड़ देखने में आई, वह हैरानी की बात है। इसे कई स्तर पर लोकतंत्र के हनन के रूप में भी देखा गया। बहस जिन मुद्दों पर या कर्नाटक चुनावों पर होनी चाहिए थी, वे गायब थीं और बहस का केंद्र बन गया 2019 का आम चुनाव। एक तरफ मोदी सरकार के चार साल के कामों पर बात हो रही थी, सवाल पूछे जा रहे थे, तो दूसरी तरफ 2019 में सत्ता की संभावनाओं को तराशा जा रहा था।

कहा जा रहा है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो चुनावों को अपना बाजार समझने वाले टीवी चैनलों के सामने तो बाकी समय खबरों का अकाल पड़ जाएगा! जहां तक मेरा मानना है, लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने से किसी एक पार्टी फिर चाहे वह राज्यों में खराब प्रदर्शन क्यों न करती हो, उसी की जीत की संभावना ज्यादा होगी। बल्कि जहां जीतने की संभावना नगण्य होगी, वहां भी वह जीत जाएगी। ऐसा माना जाता है कि केंद्र और राज्य दोनों में एक ही पार्टी की सरकार होने से ऐसा कुछ खास होता नहीं जितना होना चाहिए। जैसे मध्यप्रदेश, राजस्थान अन्य जगहों पर देखा जा सकता है। ऐसा लगता है कि भारत में राजनीति मात्र चुनाव लड़ने तक ही सिमट के रह गई है। जनता के हितों से जुड़े मुद्दे बहस से गायब होते जा रहे हैं। यह आदर्श स्थिति नहीं है। जरूरत इस बात की है कि आम जन की समस्याओं से संबंधित विषयों पर बहस हो।

गरिमा सिंह, डीएसजे, दिल्ली

सेहत का पायदान

लांसेट पत्रिका ने वैश्विक स्वास्थ्य सूचकांक जारी की है, जिसमें हमारे देश में लोगों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था की दृष्टि से एक चिंताजनक तस्वीर है। इसकी रिपोर्ट में स्वास्थ्य विभाग के लचर प्रदर्शन और भ्रष्ट नीतियों का पर्दाफाश है। इसके बरक्स हमें केरल को देखना चाहिए, जिसने पूरे देश में बेहतर प्रदर्शन किया है। इससे यह पता चलता है कि केरल सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में ईमानदारी से काम किया और मरीजों का खयाल रखा। जाहिर है, केरल का उदाहरण केवल सामने रखने के लिए नहीं, बल्कि उससे सीख लेने के काम में आना चाहिए।

निलेश मेहरा, दिल्ली

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