read chopal about hunger death and unemployment - चौपालः 'भुखमरी के बरक्स' और 'दावों की हकीकत' - Jansatta
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चौपालः ‘भुखमरी के बरक्स’ और ‘दावों की हकीकत’

पिछले कुछ सालों में जिस तरह रोजगार के मौके घटे हैं, उससे मौजूदा सरकार के नीतियों पर प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। कृषि क्षेत्र की सकल घरेलू उत्पाद में घटती हिस्सेदारी से साफ कि हमारी उत्पादकता कम हुई है।

Author June 7, 2018 4:59 AM
संयुक्त राष्ट्र की भूख संबंधी सालाना रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में सबसे ज्यादा भुखमरी के शिकार भारतीय ही हैं।

भुखमरी के बरक्स

आम आदमी का पहला अधिकार क्या है? कम से कम दो वक्त की सूखी रोटी! लेकिन झारखंड के गिरिडीह जिले में जिस सावित्री देवी को आम आदमी के अधिकार का नारा बुलंद करते हुए आधार कार्ड पकड़ा दिया गया था, उस महिला को सरकार और प्रशासन ने एक अदद राशन कार्ड मुहैया कराना जरूरी नहीं समझा, ताकि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली सावित्री पेट भरने का इंतजाम कर पाती। नतीजतन, बीते शनिवार को सावित्री के भूख से दम तोड़ देने की खबर आई। सावित्री देवी के परिवार के हालात यह थे कि तीन दिन से उनके घर में चूल्हा तक नहीं जला था। भूख से होती मौत का इकलौता उदाहरण सिर्फ सावित्री देवी का नहीं है। पिछले साल झारखंड के ही कारिमोटी गांव में ग्यारह वर्षीया संतोषी नामक बालिका की भूख से मौत हो गई थी। उसकी मां ने कहा था कि बेटी भात-भात बोलते हुए मर गई।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र की भूख संबंधी सालाना रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में सबसे ज्यादा भुखमरी के शिकार भारतीय ही हैं। यह विचारणीय और चिंतनीय है कि हमारे देश में भूख से जूझ रहे लोगों को संख्या चीन से भी ज्यादा है। इसकी एक बड़ी वजह हर स्तर पर होने वाली अन्न की बर्बादी है, क्योंकि हमारे यहां हर साल करोड़ों टन अनाज बर्बाद होता है। तो देश में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं कि बर्बाद होता अन्न भूखे लोगों तक पहुंच सके?

खुद उपभोक्ता मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि पिछले पांच बरस में 98000 हजार टन फल, सब्जी, अन्न भंडारण के दौरान बर्बाद हो गए। ये अन्न इतना है कि देश में हर महीने दस लाख परिवारों का पेट भर सकता है। सावित्री देवी भी उनमें से एक हो सकती थी। मगर अफसोस की कृषि प्रधान कहे जाने वाले इस देश में तीस करोड़ जनता भूखी सोती है। देश का यह अनूठा सच है, जिसमें हमारी व्यवस्था और सरकार फेल है, अधिकारी संवेदनशील नहीं और सरकारों को न तो भूख से मौत पर और न अनाज के बर्बाद हो जाने से कोई असर पड़ता है।

रोहित झा, पालम, नई दिल्ली

दावों की हकीकत

पिछले कुछ सालों में जिस तरह रोजगार के मौके घटे हैं, उससे मौजूदा सरकार के नीतियों पर प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। कृषि क्षेत्र की सकल घरेलू उत्पाद में घटती हिस्सेदारी से साफ कि हमारी उत्पादकता कम हुई है। रोजगार सृजन को लेकर देश में विचित्र भ्रम उत्पन्न हो गया है। निर्माण क्षेत्र में नियमित निवेश न होने के कारण स्थिति गंभीर हो गई। सरकार के ‘स्किलिंग प्रोग्रामों’ में तात्कालिक लक्ष्यों पर ध्यान दिया जा रहा है।

ऐसे में गुणवत्ता की बात नहीं हो सकती। वित्त मंत्रालय के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट यों तो संगठित क्षेत्र में रोजगार बढ़ने की बात कहती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। मोदी सरकार का स्व-रोजगार कार्यक्रम और स्टार्ट-अप प्रोग्राम भी अपने लक्षित उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पा रहा है। मुद्रा लोन का मकसद रोजगार के मौके को बढ़ाना था, न कि योजनाओं के पैसो से जीवनयापन करना।

गौरव कुमार ‘निशांत’, वाराणसी

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