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चौपालः सरोकारों के सवाल

एक तरफ किसान अशिक्षित है, जोतों का आकार छोटा है, नतीजतन, लागत अधिक लगती है। भूमि के असमान वितरण पर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया और न देना चाहते हैं।

Author June 11, 2018 04:53 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (पीटीआई फाइल फोटो)

सरोकारों के सवाल

आज किसान जीवन एक करुण व्यथा होकर रह गया है। परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े होने से लेकर आज स्वतंत्रता के छह दशक गुजर जाने के बाद भी किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। तब भी किसान मारे जा रहे थे और अब भी। भारतीय किसानों की इस हालत के लिए कौन जिम्मेदार है और इसका समाधान क्या है? आखिर सरकारें आज तक विफल क्यों रही हैं? अब तक गठित न जाने कितने आयोगों ने सुधार के अनेक सुझाव दिए हैं। समय-समय पर सरकारों ने किसानों के कर्जे माफ किए। फिर भी कर्ज से दबा किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। कर्ज के जाल के सवाल पर हुक्मरानों और साहूकारों का चरित्र एक-सा लगता है।

एक तरफ किसान अशिक्षित है, जोतों का आकार छोटा है, नतीजतन, लागत अधिक लगती है। भूमि के असमान वितरण पर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया और न देना चाहते हैं। किसी के पास दो कट्ठा भी जमीन नहीं है और किसी के पास सैकड़ों-हजारों एकड़ जमीन, वह भी अनुपयोगी पड़ा हुआ है। भारत में जब भूमि सुधार लागू किया गया, जमींदारी का उन्मूलन किया गया, तो वह एक महत्त्वपूर्ण कदम था। लेकिन इस सुधारात्मक कदम पर सुविधाभोगी वर्ग की चालाकियां भारी पड़ीं। कागजी रूप से तो बड़े भूस्वामियों ने जमीन का हस्तांतरण अपने यहां कार्य करने वाले मजदूरों के नाम कर दिए, लेकिन उनका कब्जा आज भी उस जमीन पर बना हुआ है। इस सुधार से जो अपेक्षा थी, वह पूरी नहीं हुई। सरकारों ने इस यथार्थ को समझने कि कोशिश नहीं की।

हमारा समाज अनेक वर्गों में बंटा हुआ है। आर्थिक सवालों पर सार्थक बहस का सर्वथा अभाव रहा है। आर्थिक उन्नति का सामान्य अर्थ इस देश में कॉरपोरेट की उन्नति से लगाया जाता रहा है। हम रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट की खूब चर्चा सुनते हैं। पर हम उस ‘रेटकी बात नहीं करते जो किसान को उसके उत्पादों का मिलना चाहिए। सरकार उन कर्जों पर चर्चा नहीं करना चाहती, जिसे बड़े कॉरपोरेट और उद्योगपति डकार जाते हैं। हां, उन गरीब किसानों पर प्रशासन की लाठी-गोली जरूर चल जाती है जो अब तक उनके पेट भरता रहा है। किसान समस्या, दहेज प्रथा, जाति-पांति, धार्मिक पाखंड, नारी शोषण, अशिक्षा, नशाखोरी आदि को केंद्र में रख कर नीतियों का निर्माण किया जाना आवश्यक है।

याद नहीं पड़ता जब संसद में सही मुद्दों को लेकर सार्थक बहस हुई हो। जनता के गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए संसद की कोलाहल में जाया हो जाते हैं। आरोप-प्रत्यारोप के दौर चलते रहते हैं। इसमें हमारे मूल सवाल गुम हो जाते हैं। वर्तमान किसान आंदोलन ने किसान समस्या को एक बार फिर जरूर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। इस आंदोलन ने सरकार को वास्तविक सरोकारों को याद दिलाने की कोशिश की है। यह आंदोलन किसानों की जागृत होती सामूहिक चेतना का सूचक है।

अमरजीत कुमार, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल

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