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चौपालः संकट में भूजल

भूजल की मात्रा को बनाए रखने के संतुलित, समुचित प्रयास और व्यवस्था की कमी देखी जाती रही है। शहरी के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भूगर्भ जल की कमी से संबंधित चुनौतियों से निपटने और उसके उपचार के लिए सामुदायिक प्रबंधन की व्यवस्था बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है।

Author June 12, 2018 05:32 am
भूजल की मात्रा को बनाए रखने के संतुलित, समुचित प्रयास और व्यवस्था की कमी देखी जाती रही है।

एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय भूजल संरक्षण दिवस आकर गुजर गया, लेकिन चिंताएं जताने के सिवा कुछ ठोस पहलकदमी होती नहीं दिखी। जबकि पृथ्वी पर मौजूद कुल जल संपदा का केवल तीन प्रतिशत जल ही पीने योग्य शुद्ध अवस्था में है। इसमें से भी भूगर्भ जल का प्रतिशत 0.03 मात्र है। आज विभिन्न कारणों से स्वार्थवश भूगर्भ जल का आवश्यकता से अधिक मनमाने ढंग से दोहन किया जा रहा है। जिस दर से भूगर्भ से जल की निकासी की जा रही है उसकी तुलना में भूगर्भ में वापस जल भेजे जाने की दर बेहद कम है।

भूजल के गिरते स्तर के दुष्परिणाम सबके सामने हैं। देश-विदेश के कई शहर पानी की कमी के कारण ‘डे जीरो’ की स्थिति की बढ़ रहे। भूगर्भ जल के निकाले जाने के बाद फिर से नहीं भर जाने की स्थिति में खाली पड़े कोटर भूकम्प आने की स्थिति में विध्वंस की क्षमता को बढ़ाने में सहायक होते हैं। समुद्र किनारे बसे क्षेत्रों में शुद्ध जल निकाले जाने से खाली हुए कोटरों में समुद्री नमकीन पानी के आने की पुष्टि हुई है।

भूजल की मात्रा को बनाए रखने के संतुलित, समुचित प्रयास और व्यवस्था की कमी देखी जाती रही है। शहरी के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भूगर्भ जल की कमी से संबंधित चुनौतियों से निपटने और उसके उपचार के लिए सामुदायिक प्रबंधन की व्यवस्था बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में व्यतिगत स्तर और सामुदायिक भागीदारी के जरिये वर्षा जल के संचय का करके भूजल के पुन: संभरण की व्यवस्था बहुत पहले से मौजूद है। ऐसी व्यवस्था देश के बाकी हिस्सों में भी हो, ऐसा प्रयास करना होगा। सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से देश में भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए हाल ही में वित्त समिति द्वारा अटल भूजल योजना अनुशंसित की गई है। इस योजना के लिए विश्व बैंक ने 6000 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है।

इस योजना के अंतर्गत भूजल दोहन के संबंध में पच्चीस प्रतिशत क्रियाकलापों का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षेत्र सम्मिलित किए जाने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित क्षेत्रों में कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के अत्यधिक दोहन वाले, अत्यधिक जोखिम वाले और कम जोखिम वाले क्षेत्र सम्मिलित हैं। प्रस्ताव स्वागतयोग्य है, लेकिन वृहद स्तर पर कार्य करने लिए योजना के क्षेत्र और बजट को भारत सरकार के स्तर पर बढ़ाए जाने की जरूरत है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में वार्ड के मुताबिक विशेष रूप से वर्षा जल संरक्षण के लिए पर्याप्त शक्ति और संसाधन युक्त सामुदायिक समितियां स्थापित करनी होगी। समिति के माध्यम से आम लोगों के बीच जागरूकता फैलानी होगी, ताकि लोग भूगर्भ जल के महत्त्व को समझते हुए इसके संरक्षण की दिशा में व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित हों।

ऋषभ देव पांडेय, कोरबा, छत्तीसगढ़

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