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चौपालः जाति की जड़ता

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा जिले के थुरल गांव में जाति के नाम पर जो गुंडागर्दी की खबर सामने आई है, वह शर्मनाक है। एक व्यक्ति को इंसानियत के दुश्मनों ने सिर्फ इसलिए बेरहमी से पीटा कि उसने अपनी पोतियों की प्यास बुझाने के लिए सार्वजनिक वाटर कूलर से पानी लेने की कोशिश की।

Author June 13, 2018 05:30 am
भारत के शहरी इलाकों में जातिगत भेदभाव कम दिखता है, लेकिन दूसरी शक्ल में यह आज भी कई जगहों पर अपने विकृत चेहरे के साथ परेशान करता है।

जाति की जड़ता

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा जिले के थुरल गांव में जाति के नाम पर जो गुंडागर्दी की खबर सामने आई है, वह शर्मनाक है। एक व्यक्ति को इंसानियत के दुश्मनों ने सिर्फ इसलिए बेरहमी से पीटा कि उसने अपनी पोतियों की प्यास बुझाने के लिए सार्वजनिक वाटर कूलर से पानी लेने की कोशिश की। सरकार, प्रशासन और पुलिस को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इस मामले के आरोपियों को इतनी सख्त सजा दिलानी चाहिए कि कोई दूसरा सपने में भी जातपात के नाम पर गुंडागर्दी तो क्या अनुसूचित जाति के बारे कुछ भी आपत्तिजनक न सोचे। यह बहुत ही निंदनीय है कि आज दुनिया चांद और मंगल पर पहुंच गई है, लेकिन अभी भी कुछ लोग जातिगत भेदभाव की संकीर्ण घटिया सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं।

भारत के शहरी इलाकों में जातिगत भेदभाव कम दिखता है, लेकिन दूसरी शक्ल में यह आज भी कई जगहों पर अपने विकृत चेहरे के साथ परेशान करता है। भारत में अभी भी बहुत से ऐसे गांव हैं, जहां जाति की बीमारी बेहद क्रूर तरीके से जीवित है। एक समय ऐसा भी था जब यह जातिवाद और छुआछूत की सामाजिक बुराई बहुत फैली हुई थी। समय के साथ-साथ यह बुराई कुछ कम हुई दिखती है, लेकिन रूढ़िवादी संकीर्ण सोच के कारण कई बार यह बेलगाम शक्ल में सामने आती है। आज भी पढ़े-लिखे होने के बावजूद कुछ लोग निम्न दर्जे की सोच से पीड़ित हैं और अपने से निम्न कही जाने वाली जाति के लोगों को नफरत की नजर से देखते हैं। इससे निजात पाए बिना कोई भी व्यक्ति या समाज खुद को सभ्य कहने का दावा नहीं कर सकता।

’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

नोटबंदी के बाद

नोटबंदी की घोषणा के बाद लगभग बीस महीने बीत गए, लेकिन अभी तक पांच सौ और एक हजार के कितने नोट वापस आए, इसके आंकड़े जारी नहीं हुए। रुपए की महंगी मशीन भी आर्इं, लेकिन गिनती अभी भी अधूरी। वास्तविकता यह है कि बीस महीने में मशीन क्या, हाथ से नोट गिन लिए जाते। सवाल है कि आंकड़े जारी नहीं करने की वजह क्या यह है कि प्रचलन में जो नोट थे, उनसे अधिक मात्रा मे नोट वापस आ गए? नेपाल के रास्ते में अभी भी नकली नोट पकड़े जाने की खबरें आ रही हैं। इसकी सीमा क्या होगी? विचित्र यह है कि कोई भी राजनीतिक दल आंकड़ों की बात नहीं कर रहा।

’यश वीर आर्य, देहरादून

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