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चौपालः योजना की सीमा

क्या बिना बेईमान, मुफ्तखोर, अकर्मण्य, विभिन्न प्रकार के मुआवजों का आकांक्षी और परमुखापेक्षी बने किसान का कल्याण नहीं हो सकता। देश की समस्त राजनीतिक प्रणाली कर्ज माफी, मुफ्त बिजली-पानी आदि के सब्जबाग दिखा कर वोट लेने की रणनीति पर चल रही है।

Author June 12, 2018 5:31 AM
सरकार की तरफ से भले ही योजनाएं बनी हों और बजट आबंटन हुआ हो, लेकिन कारीगरों के हालात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि केवल सरकारी कागजों में सिमट कर रह गई।

योजना की सीमा

रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर बाजार में मौजूद लगभग सभी सामानों के संदर्भ में देखें तो मशीनीकरण इतना बढ़ चुका है कि हाथ के कारीगर कम ही रह गए हैं। बड़े-बड़े ब्रांड के उत्पादों की चकाचौंध में हाथ का छोटा कारोबार खत्म होने की कगार पर है। पीढ़ियों से पेशे के तौर पर चलता आ रहा कार्य नई पीढ़ी आगे बढ़ना ही नहीं चाहती, क्योंकि मेहनत के बावजूद कमाई से पेट तक नहीं भरता है। ऐसे में हाथ के धंधे को आगे बढ़ाने का मनोबल लोग नहीं जुटा पा रहे हैं। हाथों से बनाई गई चीजों का जुड़ाव बाजार से तो होता है, लेकिन नई पीढ़ी को उनकी विशेषता के बारे में पता तक नहीं है।

सरकार की तरफ से भले ही योजनाएं बनी हों और बजट आबंटन हुआ हो, लेकिन कारीगरों के हालात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि केवल सरकारी कागजों में सिमट कर रह गई। हाथ के कारीगरों को लेकर बनाई गई योजना ज्यादातर अधिकारी जानते तक जानते नहीं है। ऐसे में योजना हाथ के कारीगरों तक पहुंचाना तो दूर की बात होती है। हाथों के रोजगार को ज्यादा लोगों से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोलने होंगे, जिससे उनके हाथों की कारीगरी को खत्म होने से बचाया जा सके।

’महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान
विचित्र फरमान

हरियाणा सरकार की ओर से एक विवादास्पद अधिसूचना सामने आई है। हरियाणा के खेल जगत से जुड़ी हस्तियों को उनके आय की तैंतीस प्रतिशत राशि हरियाणा खेल परिषद में जमा करने के लिए कहा गया है। खेल से मिलने वाली राशि हो, विज्ञापन की आय हो या सरकार द्वारा मुहैया कराई गई नौकरी हो, एक तिहाई आय को सरकार को देना होगा। यह विचित्र फरमान जारी करने का आशय क्या हो सकता है?

खेल के विकास में कौन हिस्सेदार होना चाहता है, यह उससे पूछ कर किया जाना चाहिए। अब इस मसले पर जिस तरह का विवाद खड़ा हो रहा है, उससे इस बात की आशंका खड़ी हो रही है कि राज्य के तमाम नामी-गिरामी खिलाड़ी इस फरमान का विरोध करेंगे और इसके लिए कानूनों की मदद लेंगे। क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों के खिलाड़ियों की स्थिति पहले ही संतोषजनक नहीं है। बड़ी उपलब्धियों के बावजूद उन्हें सरकार की ओर अपेक्षित प्रोत्साहन या मदद के लिए राशि नहीं मिलती। इसके बावजूद जो कमाई होती है, उसमें से भी एक तिहाई सरकार को देने के फैसले से यह समझना मुश्किल है कि सरकार खेलों के प्रोत्साहन के बजाय इस तरह खिलाड़ियों को दुविधा में डाल कर क्या हासिल करना चाहती है!

’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

निशाने पर किसान

क्या बिना बेईमान, मुफ्तखोर, अकर्मण्य, विभिन्न प्रकार के मुआवजों का आकांक्षी और परमुखापेक्षी बने किसान का कल्याण नहीं हो सकता। देश की समस्त राजनीतिक प्रणाली कर्ज माफी, मुफ्त बिजली-पानी आदि के सब्जबाग दिखा कर वोट लेने की रणनीति पर चल रही है। कृषि विकास और पैदावार बढ़ा कर आय को कई गुना बढ़ा लेना न किसान चाहता है, न सरकार। सभी बेईमानी को प्रोत्साहित करते हुए ऐसे तरीके ही आजमाना चाहते है। क्या किसान एवं गैर-किसान उपभोक्ता की प्राप्तियों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है? अगर यह सब खर्च दलीय या अपनी जेब के बजाय सरकारी कोष से किया जाना है तो ईमानदार करदाता क्यों अपनी खून-पसीने की कमाई कर के रूप में जमा कराए? क्या कभी ऐसे किसान को गले लगा कर सम्मानित किया गया है, जिसने समय पर कर्ज लौटा कर प्राप्त सेवाओं का भुगतान कर ईमानदार, स्वावलंबी, कर्मशीलता का परिचय दे कानून-व्यवस्था को धता न बताया हो?

’राधेश्याम ताम्रकर, ठीकरी, इंदौर

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