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चौपालः पानी का प्रबंध

हाल ही में जब हिमालय की गोद में बसे शिमला से जल संकट की खबर आई तो यह समूचे देश के लिए एक खतरे की घंटी थी। इसके बाद ग्वालियर से पुलिस की सुरक्षा में पानी बांटने की खबर ने समस्या की गंभीरता को दर्शा दिया कि आने वाले वक्त में पानी एक दुर्लभ स्रोत हो जाएगा।

Author June 13, 2018 5:24 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

हाल ही में जब हिमालय की गोद में बसे शिमला से जल संकट की खबर आई तो यह समूचे देश के लिए एक खतरे की घंटी थी। इसके बाद ग्वालियर से पुलिस की सुरक्षा में पानी बांटने की खबर ने समस्या की गंभीरता को दर्शा दिया कि आने वाले वक्त में पानी एक दुर्लभ स्रोत हो जाएगा। हम बचपन से ही सुनते आए हैं कि जल ही जीवन है। अगर जल नहीं तो जीवन नहीं। हमारे ग्रह के एक तिहाई हिस्से में पानी है, लेकिन इनमें सिर्फ तीन प्रतिशत के करीब ही पीने लायक है। इसमें भी दो प्रतिशत ग्लेशियर के रूप में है। कुल पानी का सिर्फ 0.0014 प्रतिशत ही आसानी से उपलब्ध होने वाला पानी है।

ऐसे में जरूरत है एक बेहतर जल प्रबंधन की, जिससे हम अपने जीवन को इस ग्रह पर भविष्य के लिए संरक्षित करें। हमारे उपयोग होने वाले जल का 67 प्रतिशत हिस्सा कृषि कार्यों में बर्बाद हो जाता है। ग्यारह प्रतिशत औद्योगिक इकाइयों में उपयोग होता है और बाकी का ग्यारह से बारह प्रतिशत जल हमारे दैनिक उपयोग में आता है। अगर हम अपने कृषि में आधुनिक तकनीक के माध्यम से सिंचाई के लिए जल का उपयोग करेंगे तो इसमें होने वाले जल की बर्बादी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इस्राइल आज इस ओर प्रयास करके रेगिस्तान में भी सब्जी और कृषि उत्पादों का प्रमुख उत्पादक बन गया है।

जबकि इस्राइल में नदियों के साथ-साथ जल की उपलब्धता बहुत कम है। वह समुद्र के पानी को तकनीक के माध्यम से पीने लायक बनाता है। इसके अलावा, वह अपने पानी के अस्सी प्रतिशत का पुनर्चक्रण और पुनरुपयोग करता है। हमारे देश में नदियों का जाल होने के बावजूद जल संकट हो रहा है। हिमालय से निकलने वाली जो नदियां कभी नहीं सूखती थीं, आज उनकी जल धारा लुप्त हो रही है। समय रहते अगर हमने जल बर्बादी पर काबू पाने के साथ-साथ पानी के वैकल्पिक स्रोत नहीं ढूंढ़े तो वह दिन दूर नहीं, जब हम पानी के लिए तरसने वाले देश के रूप में जाने जाएंगे।

नीरज झा, दिल्ली विश्वविद्यालय

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