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चौपालः सुविधा की सीमा

अभी बैंको का एनपीए दस लाख करोड़ हो चुका है जो और बढ़ सकता है, क्योंकि इस बात की गारंटी नहीं है कि ऋण ‘मोरेटोरियम’ के बाद लोग अपना कर्ज चुका ही देंगे।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के द्वारा दी गई ऋण ‘मोरेटोरियम’ की अवधि एक सितंबर को समाप्त हो चुकी है।

‘राहत की उम्मीद’ (संपादकीय, 3 सितंबर) पढ़ा। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के द्वारा दी गई ऋण ‘मोरेटोरियम’ की अवधि एक सितंबर को समाप्त हो चुकी है। इस सुविधा के तहत अगर ग्राहक कर्ज की किश्त न चुकाए तो उस पर कोई करवाई नहीं होगी, न ही उसका सिविल और क्रेडिट मानक खराब होगा, लेकिन उसे ब्याज दर हर महीने के हिसाब से जोड़ कर देना होगा। यही लोगों के लिए परेशानी बनी हुई है कि जब काम ठप पड़ा हो, हाथ में पैसे न हो, नौकरी चली गई हो या वेतन कम मिल रहा हो तो आखिर वह किश्त और ब्याज कैसे चुकाए! बैंकों की नजर से देखें तो अगर वे ऋण पर लगने वाला ब्याज दर ‘मोरेटोरियम’ में माफ करते हैं या ऋण मोरेटोरियम की अवधि को और बढ़ाते हैं तो बैंकों का एनपीए बढ़ने का खतरा है। अलग-अलग बैंको के द्वारा जारी किए गए आकड़ों के मुताबिक अभी तक तीस फीसद ऋण का मोरेटोरियम कराया जा चुका है और किसी-किसी बैंक का तो सत्तर फीसद ऋण ‘मोरेटोरियम’ हो चुका है।

अभी बैंको का एनपीए दस लाख करोड़ हो चुका है जो और बढ़ सकता है, क्योंकि इस बात की गारंटी नहीं है कि ऋण ‘मोरेटोरियम’ के बाद लोग अपना कर्ज चुका ही देंगे। ऐसे में सरकार को कोई बीच का रास्ता चुनना पड़ेगा, जिससे बैंक और जनता- दोनों का भला हो सके। हालांकि ‘मोरेटोरियम’ का फायदा कोई तभी उठाएं जब बहुत ज्यादा मजबूरी हो, क्योंकि आपको भले ऋण की किश्त न देनी हो, लेकिन उस पर लगने वाला ब्याज दर तो हर महीने लगेगा ही, जो कि आगे चलकर आपके लिए बहुत बड़ी आफत बन सकता है।
’गौरव कुमार, गया, बिहार

न्याय की बात
बात सिर्फ कफील खान की नहीं, बल्कि बात उन बहुत सारे बेकसूर लोगों की है, जिन्हें देश-समाज के रसूखदार लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए बलि का बकरा बना कर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा देते हैं। ऐसे कई लोगों की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जेल में कट जाता है। लंबे समय तक उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में देरी के कारण जेल में मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, जिसका दंश शायद वह ताउम्र झेलता है। जेल में डाले गए ऐसे निर्दोष लोगों को कुछ वक्त बाद अदालतें बाइज्जत बरी भी कर देती हैं, तो क्या उस व्यक्ति पर लगा सामाजिक लांछन उसे चैन से जीने दे पाता है?

कारावास के दौरान उसके परिवार के सदस्यों को जो आर्थिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़ते हैं, उसकी जवाबदेही कौन लेता है? से छूट कर अपनी खोई हुई सामाजिक प्रतिष्ठा से अगर वह समझौता कर भी ले तो उसकी खोई हुई नौकरी या फिर उसका डूबा हुआ व्यापार कब तक उसके जीवन को पटरी पर ला सकेगा, यह अंदाजा लगाना भी बेहद मुश्किल होता है। क्या यह हमारे देश के पुलिस तंत्र और न्यायपालिका की व्यवस्था की असफलता नहीं है?

इस प्रकार किसी का जीवन तबाह कर देना क्या किसी संवैधानिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ नहीं है? ऐसी स्थिति में मिथ्या अभियोग लगा कर कानूनी दांवपेच में उलझाने वाले उन रसूखदार लोगों से न्यायालय द्वारा क्या एक बड़ा हजार्ना नहीं वसूला जाना चाहिए, ताकि भुक्तभोगी या पीड़ित के जीवन को दुबारा पटरी पर लाने में सहूलियत मिल सके?
’रुपेश गुप्ता, इंदिरापुरम, गाजियाबाद

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