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चौपाल: देर है, अंधेर नहीं

भारत में पिछले दो-तीन दशकों में अन्य अपराधों की तुलना में बलात्कार की संख्या में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है और इनसे जुड़े दोषियों को सजा देने के मामले में हम सबसे पीछे रहते हैं। वहीं संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईराक, चीन, इंडोनेशिया, पोलैंड आदि देशों में इस संगीन अपराध के लिए कठोर कानून हैं।

Author Published on: March 26, 2020 2:23 AM
न्यायपालिका में देर से ही सही लेकिन आया न्यायिक फैसला और देश की बेटी को मिला इंसाफ।

निर्भया के साथ दरिदंगी की सारी हदें पार करने वाले हैवानों को उनके किए की सजा मिल चुकी है सजा-ए-मौत के रूप में, और यही कारण है कि हम सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद भारतीय न्यायिक व्यवस्था के प्रति आश्वस्त हो सकते हैं कि यहां देर है, अंधेर नहीं। यह देरी हममें बेबसी, लाचारी, क्षोभ और बेचैनी बढ़ाने में कारगर सिद्ध होती है और ऐसी अभावग्रस्त स्थितियों में हम पीड़िता या उसके परिवार को ढांढस बांधने के अलावा कुछ नहीं कर पाते, हालांकि कभी-न-कभी न्याय अवश्य मिलेगा, यह विश्वास जरूर दिला पाते हैं।

भारत में पिछले दो-तीन दशकों में अन्य अपराधों की तुलना में बलात्कार की संख्या में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है और इनसे जुड़े दोषियों को सजा देने के मामले में हम सबसे पीछे रहते हैं। वहीं संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईराक, चीन, इंडोनेशिया, पोलैंड आदि देशों में इस संगीन अपराध के लिए कठोर कानून हैं। हालांकि हम भविष्य में यह उम्मीद अवश्य कर सकते हैं कि इस जघन्य अपराध के विरुद्ध तत्परता से कार्रवाई की जाए और सख्त-से-सख्त कानून लागू किए जाएं ताकि निर्भया के साथ हुई बर्बरता को देश की अन्य बेटियों के साथ दोहराने से बचाया जा सके और अन्य देशों के समक्ष एक सुदृढ़ और सशक्त न्यायिक व्यवस्था का उदाहरण प्रस्तुत हो सके।
’कुसुम त्रिपाठी, दिल्ली विश्वविद्यालय

शासन में नैतिकता
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के पुन: शपथ लेने के बाद सहज ही ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या राजनीति में नैतिकता की आवश्यकता नहीं है? क्या जोड़-तोड़ कर महज सत्ता में रहना ही राजनीतिक दलों का मुख्य उद्देश्य है? क्या राजनेताओं के लालच और पद-लोलुपता का कोई अंत नहीं?

बाईस विधायकों द्वारा सदन से त्यागपत्र देकर तत्कालीन सरकार को अल्पमत में लाकर गिराना भले ही कानूनी रूप से गलत नहीं दिख रहा, पर नैतिक रूप से यह गलत है। यह बात तब और पुष्ट होती है, जब ये सारे विधायक त्यागपत्र स्वीकृति के कुछ ही समय बाद विरोधी पार्टी की सदस्यता स्वीकार कर लेते हैं। यह धन-बल का उपयोग नहीं तो और क्या है? द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने ‘शासन में नैतिकता’ के तहत दल-बदल और विधायकों की निरर्हता पर चर्चा की है।

पर, उसमें ऐसी किसी समस्या पर चर्चा नहीं हुई है, जो मध्यप्रदेश विधानसभा में घटित हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि अधिक से अधिक विधायकों को निरर्हित करके ही दंडित किया जा सकता है। पर यहां तो विधायकों ने स्वयं त्यागपत्र दे दिया। यह इस बात का द्योतक है कि ये सारे विधायक राजनीति में लोकसेवा के उद्देश्य से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाभ से ज्यादा प्रेरित हैं। यह उन बाईस विधानसभा क्षेत्रों के साथ साथ पूरे राज्य की जनता के साथ धोखा है, क्योंकि जनादेश के विपरीत सरकार बनी है।
’कुमार ऋषिराज, राजगीर, बिहार

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