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चौपालः राहुल के सामने

राहुल गांधी ऐसे समय प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं, जब कांग्रेस का पतझड़ काल चल रहा है।

Author May 17, 2018 05:04 am
(फोटो- पीटीआई)

राहुल गांधी ऐसे समय प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं, जब कांग्रेस का पतझड़ काल चल रहा है। ऐसे में कांग्रेस का 2019 के लोकसभा चुनाव में बहुमत में आना फिलहाल संभव नहीं दिखता। अगर राहुल गांधी की पार्टी आम चुनावों में सबसे बड़े दल के रूप में भी उभरना चाहती है तो भी उन्हें पहाड़-सी चुनौतियों से पार पाना होगा।

पार्टी के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती तो सोशल मीडिया के दौर में भ्रष्टाचार, वंशवाद और हिंदू-विरोधी नकारात्मक छवि को बदलने की है। दूसरी चुनौती कांग्रेस के पास प्रधानमंत्री मोदी के कद के करिश्माई नेता का न होना है। हालांकि राहुल के नेतृत्व में भद्रता, विनम्रता और संवेदना तो झलकती है, लेकिन नजरिये की व्यापकता नहीं। ऐसे में राहुल गांधी देश का नेतृत्व करने की सोच रहे हैं तो उन्हें भारत को आगे बढ़ाने का एक अलग और साफ खाका पेश करना होगा। उन्हें बताना होगा कि अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो बढ़ती बेरोजगारी, किसान आत्महत्या, बैंकिंग संकट, आर्थिक विषमता, विनिर्माण तथा पर्यावरण क्षेत्र की राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान कैसे निकालेंगे। राहुल राजग सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की अकसर आलोचना करते रहे हैं। ऐसे में उन्हें विकास के मॉडल और विदेशी नीति को लेकर अपना नजरिया आम जनता के समक्ष रखना होगा।

इतना ही नहीं, मौजूदा सरकार से युवाओं सहित जिन वर्गों का मोहभंग हो रहा है उन्हें राहुल गांधी किस तरह आकर्षित कर अवसर को भुना पाते हैं यह उनके नेतृत्व की असली परीक्षा होगी। ऐसे में मोदी जैसे करिश्माई नेता एवं प्रभावशाली वक्ता से मुकाबला करने लिए राहुल को देहभाषा और भाषण देने के अंदाज में आक्रामकता लाने की जरूरत है ताकि युवा आबादी को ज्यादा से ज्यादा जोड़ सकें।

राहुल के सामने तीसरी बड़ी चुनौती पार्टी संगठन में नई जान फूंकने की है। पार्टी में जड़ता आ गई है। न तो कांग्रेस कार्यसमिति के नियमित चुनाव हो रहे हैं, न निचले स्तर पर ऐसा कुछ देखा जा रहा है। पार्टी के पास केंद्रीय नेतृत्व तो है पर जमीनी नेतृत्व विकसित नहीं हो पा रहा है। ऐसे में राहुल गांधी को संगठन में बड़े स्तर पर बदलाव करने की जरूरत है। साथ ही जमीनी नेताओं और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद बनाने के तरीके खोजने होंगे ताकि लगातार मिल रही चुनावी हार से हताश जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल लौटाया जा सके। इसके अलावा वक्त की नब्ज पहचानते हुए अब पार्टी में पुरानी, अनुभवी तथा नई प्रतिभाओं के बीच संतुलन बनाने पर भी ध्यान देना होगा।

’कैलाश एम बिश्नोई, जोधपुर

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