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चौपालः सुधार पर संशय

पचास-साठ के दशक में विद्युत उत्पादन और वितरण स्थानीय स्तर पर होता था जिसे मार्टीन बर्न जैसी कंपनियां संभालती थीं। तब बिजली सिर्फ बड़े शहरों में मिला करती थी।

Author August 22, 2018 5:40 AM
निजीकरण से बिजली की आपूर्ति सही तरीके से होती है तो उसके साथ-साथ बिजली बिल की मार भी लोगों पर अच्छी-खासी पड़ने वाली है।

पचास-साठ के दशक में विद्युत उत्पादन और वितरण स्थानीय स्तर पर होता था जिसे मार्टीन बर्न जैसी कंपनियां संभालती थीं। तब बिजली सिर्फ बड़े शहरों में मिला करती थी। सरकार ने इसे सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाया और इसका राष्ट्रीयकरण हुआ। निस्संदेह इसका लाभ गरीबों और गांवों को भी मिला। फिर वहीं से आरंभ हुआ हानि-लाभ की गणना का सिलसिला। लगभग सभी सरकारों ने बिजली विभाग को घाटे का संगठन घोषित किया और अपने स्तर पर इसका निजीकरण करने का प्रयास किया। बिजली वितरण के क्षेत्र में अलग-अलग कंपनियां बनीं लेकिन इससे सरकारी खर्च बढ़ने के अलावा कुछ और हासिल नहीं हुआ। सरकार ने अनेक सुधार भी किए। मसलन, बिजली चोरी रोकने के लिए तारों का जाल कम से कम या उन्हें भूमिगत किया गया, नंगे एलटी तारों की जगह पीवीसी लगाने का कार्य हुआ। इससे बिजली चोरी कम हुई, ‘लाइन लॉस’ कम हुए। इस सबके बाद जब सरकारी नीतियों द्वारा शहरों में बिजली के क्षेत्र में सुधार आया और विभाग को लाभ अर्जित करने का मौका मिला तो सरकार शहरों की विद्युत व्यवस्था निजी हाथों में देने के बारे में सोच रही है।

निजीकरण से सरकारीकरण और सरकारीकरण से फिर निजीकरण करने का आखिर उद्देश्य क्या है? अगर सरकार सुधार के मामले में इतनी ही गंभीर है तो क्यों नहीं ग्रामीण क्षेत्रों का बिजली वितरण निजी हाथों में देने का फैसला करती है? उत्तर प्रदेश में पहली बार बिजली वितरण के क्षेत्र में फ्रेंचाइजी मॉडल आगरा में 2010 में लागू हुआ था लेकिन सरकार जिस आगरा को मॉडल बनाकर पांच शहरों लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी, मेरठ और मुरादाबाद में बिजली का निजीकरण करना चाहती है उस मॉडल पर सीएजी की रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में माना कि आगरा की बिजली व्यवस्था टोरेंट पावर के हाथ में देने से विद्युत निगम को 18 साल में 4000 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है। इससे साफ है कि बिजली का निजीकरण नहीं होना चाहिए। वैसे तो कहा जाता है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं; अगर किसी चीज से नुकसान होता है तो उससे फायदा भी होता है।

बिजली के निजीकरण को लेकर भी यही बात है। अगर निजीकरण से बिजली की आपूर्ति सही तरीके से होती है तो उसके साथ-साथ बिजली बिल की मार भी लोगों पर अच्छी-खासी पड़ने वाली है। निजीकरण से बिजली की दरों में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे सरकारी स्कूल-कॉलेजों, अस्पतालों और सभी प्रकार के सरकारी कार्यालयों को बढ़े हुए बिजली बिल की मार झेलनी पड़ सकती है। और तो और, बिजली के निजीकरण से बड़ी संख्या में सरकारी नौकरियां भी खत्म हो जाएंगी। बिजली के निजीकरण से कई फायदे भी हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। मसलन, उसका वितरण सही तरीके से होगा, चोरी में कमी आएगी, शायद जनता बिजली बिल सही वक्त पर जमा करे और लोगों को बिजली कटौती और उससे जुड़ी परेशानियों से छुटकारा प्राप्त होगी। लेकिन इससे प्राप्त लाभ मुट्ठी भर लोगों के हाथों में रह कर सिमट जाएगा और सरकार के बिजली विभाग द्वारा किए गए तमाम प्रयासों का लाभ बिजली विभाग को न मिलकर पूंजीपतियों के हाथ में चला जाएगा।

श्वेता गुप्ता, रुस्तमपुर, गोरखपुर

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