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चौपालः आपदा का मुकाबला

सवाल है कि कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर विकसित और अमीर देशों के मौजूदा रुख के बने रहते क्या हम इससे पैदा होने वाली स्थिति में किसी सुधार की उम्मीद कर सकते हैं? इसके बावजूद इस मसले पर वैश्विक स्तर पर चिंता जताने और हालात में सुधार होने की उम्मीद में कमी नहीं होती है।

Author Published on: May 23, 2020 2:45 AM
हम सब यह बखूबी जानते हैं कि समुद्र का तापमान क्यों बढ़ रहा है।

देश में हर साल एक नई प्राकृतिक या अन्य तरह की विपदा किसी न किसी रूप में मुंह बाए खड़ी रहती हैं। ऐसी विपदा चाहे बाढ़ हो, भूस्खलन, भूकम्प या चक्रवात हो। या फिर वह सुनामी क्यों न हो, देश में यह नित नए रूप में दस्तक देती हैं। पिछले कुछ सालों के दौरान इन आपदाओं के दिए जख्म हम आज तक भूले नहीं हैं, चाहे यह जख्म अगस्त 2015 मणिकरण में हुआ भूस्खलन का हो या 2013 में उत्तराखंड में आई त्रासदी का, या फिर चाहे पूर्वी तट वाले चक्रवातों का जो हुदहुद और फैलिन नाम से दहशत मचा कर चले गए।

इन आपदाओं के चलते देश को भारी जान-माल की क्षति भी हुई। जबकि अब समूची आधुनिक मनोवैज्ञानिक सभ्यता पर कोराना अपना कहर बरपा रहा है। यह समूचे विश्व के लिए बहुत बड़ा नासूर बन चुका है। वहीं भारत में रही-सही कसर बंगाल की खाड़ी में आए अम्फान नामक तूफान ने पूरी कर दी है। ऐसे में यह सवाल मौजू है कि आखिर ऐसी विपदाओं के आने की पीछे की वजह क्या है? आखिर क्यों उठते हैं अम्फान जैसे खतरनाक तूफान। जैसा कि वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि तूफानों के उठने के पीछे का मुख्य कारण समुद्री जल का गरम होना हैं। ज्यों ही समुद्री जल गरम होता है, त्यों ही समुद्र से उठने वाले तूफानों की भयावहता बढ़ती जाएगी।

इसके अलावा, हम सब यह बखूबी जानते हैं कि समुद्र का तापमान क्यों बढ़ रहा है। इसके पीछे की वजह साफ है- पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैंसों का बढ़ना। हमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियमित रूप से कम करने की जरूरत हैं। लेकिन जब भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने का सवाल अंतरराष्ट्रीय पर उठता है तो इस मसले पर होने वाले वैश्विक सम्मेलनों में इसका ठीकरा विकासशील देशों पर फोड़ दिया जाता है और सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जित करने वाले अमीर और विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। सवाल है कि कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर विकसित और अमीर देशों के मौजूदा रुख के बने रहते क्या हम इससे पैदा होने वाली स्थिति में किसी सुधार की उम्मीद कर सकते हैं? इसके बावजूद इस मसले पर वैश्विक स्तर पर चिंता जताने और हालात में सुधार होने की उम्मीद में कमी नहीं होती है। अगर हम ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को स्थायी रूप से कम करते जाने की पुख्ता व्यवस्था कर लेते हैं तो यह बहुत हद तक संभव है कि हम भविष्य में आने वाली ऐसी विपदाओं से बच सकते हैं।
-अली खान, जैसलमेर

स्थानीयता का आग्रह

प्रधानमंत्री ने हाल ही में स्वदेशी और स्थानीयता पर जोर दिया जो अत्यंत सामयिक है। वास्तव में ये दोनो शब्द एक ही अवधारणा के दो आयाम हैं। स्वदेशी मात्र इतना ही नहीं है कि लोग विदेशी कंपनियों के सेलफोन, कार और कंप्यूटर न खरीद कर देशी कंपनियों के ये सामान खरीदें। या रोजमर्रा के सामान कोलगेट, हिंदुस्तान लिवर, प्रॉक्टर एंड गैम्बल, आइटीसी के सामान न खरीद कर देशी कंपनियों के खरीदें जाएं। यह भी स्वदेशी है, लेकिन यह स्वदेशी की अधूरी अवधारणा है।

स्वदेशी में स्थानीयता पर आग्रह होना जरूरी है। जहां तक संभव हो, हम अपने रोजमर्रा के सामान स्थानीय स्तर पर बने हुए खरीदें। रेडीमेड कपड़ों के बजाय कपड़े खरीद कर स्थानीय दर्जियों से सिलवाने को प्राथमिकता देना चाहिए। गांधीजी का स्वदेशी यहां तक है कि एक ही स्थान पर एक वस्तु के दो व्यापारी हैं तो छोटे व्यापारी को प्राथमिकता देना चाहिए। स्वदेशी का यह भी आग्रह है कि इसे अपनाने में अगर थोड़ा आर्थिक नुकसान भी हो तो बर्दाश्त करना चाहिए।

कोरोना ने यह बता दिया है कि हर व्यक्ति को अपने घर के आसपास ही काम मिले तो वे ज्यादा सहज रहते हैं। इसके अलावा, सैनिटाइजर और मास्क आदि हमारी रोजमर्रा की वस्तुएं बनने जा रही हैं। इनके उत्पादन में बड़ी कंपनियां कूदें, इसके पहले सरकार को चाहिए कि इन्हें एमएसएमई क्षेत्र के लिए आरक्षित करके इनका स्थानीय स्तर पर उत्पादन सुनिश्चित करे। हमारे रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली कुछ वस्तुओं को एमएसएमई के लिए आरक्षित करना ही होगा, तभी लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिलेगा और स्वदेशी के साथ आत्मनिर्भरता का लक्ष्य भी प्राप्त हो सकेगा।
-आनन्द मालवीय, प्रयागराज

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