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चौपालः क्या औचित्य

उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि किसी शहर का नाम बदला गया हो। शहरों या स्थानों के नाम बदलने का सिलसिला काफी पुराना है।

Author October 18, 2018 2:37 AM
हर नाम के साथ उसका इतिहास और भावनाएं जुड़ी रहती हैं और लोगों को वह रटा रहता है। ऐसे में बिना किसी ठोस कारण के सिर्फ राजनीतिक मंशा से किसी शहर का नाम बदलने का कोई औचित्य नहीं है।

क्या औचित्य

उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि किसी शहर का नाम बदला गया हो। शहरों या स्थानों के नाम बदलने का सिलसिला काफी पुराना है। हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन कर दिया था। हरियाणा सरकार ने भी कुछ समय पहले गुड़गांव का नाम बदल कर गुरुग्राम कर दिया था। यहां विचारणीय है कि नाम बदलने की आवश्यकता ही क्या है? दरअसल, ऐसा सिर्फ राजनीतिक कारणों से किया जाता है। नाम बदलने से न केवल विरोध का सामना करना पड़ता है बल्कि सरकारी कागजात और पाठ्यक्रम में नाम बदलने पर भारी खर्च भी होता है।

हर नाम के साथ उसका इतिहास और भावनाएं जुड़ी रहती हैं और लोगों को वह रटा रहता है। ऐसे में बिना किसी ठोस कारण के सिर्फ राजनीतिक मंशा से किसी शहर का नाम बदलने का कोई औचित्य नहीं है। वैसे महज कागजों में नाम बदल देने से लोगों के दिलों में बसे नाम को नहीं बदला जा सकता। लोग पुराने नाम को ही बोलना पसंद करते हैं। कनॉट प्लेस का नाम राजीव चौक होने के बावजूद आज भी लोग उसे कनॉट प्लेस ही बोलते हैं। इसी तरह मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी अकबर प्रयागी नहीं हो सकते। फिर भी यदि किसी शहर का नाम बदलना पड़ता है तो नाम बदलने की आवश्यकता पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही सरकार को जनता की भावनाओं का ध्यान रखते हुए उसकी राय अवश्य लेनी चाहिए।

शरद कुमार बरनी, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश

स्त्री के साथ

विदेशों में काफी समय से गूंज रहा ‘मीटू’ अभियान अब भारत में भी जोर पकड़ रहा है। यह अच्छी पहल है। देखकर बहुत संतोष हो रहा है कि हमारे देश की महिलाओं में बुराइयों से लड़ने की हिम्मत आ रही है और वे अपने साथ हो रहे यौन शोषण के विरुद्ध खड़ी हो रही हैं। हमारे यहां शिक्षणसंस्थान हों या फिर दफ्तर, कहीं भी महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहीं। इस बीच अनेक कड़े कानून बना दिए गए लेकिन फिर भी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के मामले बढ़ते जा रहे हैं। हमारे यहां बड़ी संख्या में महिलाएं अपने साथ होने वाले शोषण को बाहर नहीं बताती और जिंदगी भर उसकी पीड़ा झेलती रहती हैं। इस बीच अगर ऐसा अभियान जोर पकड़ रहा है तो यह बड़ी बात है। जब तक महिलाएं अपनी लड़ाई की खुद आवाज नहीं बनेंगी तब तक उनकी आवाज कोई नहीं सुनेगा। हमें इस अभियान में महिलाओं के साथ खड़े रहने, उनके साथ हो रहे अत्याचारों को सामने लाने और दोषियों को सजा दिलाने की जरूरत है।

आशीष, रामलाल आनंद कॉलेज, दिल्ली

मुनाफे का नशा

शराब, गांजा, चरस आदि के अलावा नशे के लिए अन्य चीजें भी मौजूद हैं जिनमें नशीली दवाइयां प्रमुख हैं। ये भी अन्य नशीले पदार्थों की तरह ही खतरनाक हैं और युवाओं को लगातार मौत के मुंह में धकेल रही हैं। मेडिकल स्टोर्स पर इनकी धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। नशीली दवाओं की आसान उपलब्धता से युवा पीढ़ी तेजी से नशे की लत की शिकार होती जा रही है। जो लोग शौकिया तौर पर या अवसादग्रस्त होकर इन दवाइयों का सेवन करते हैं धीरे-धीरे वे इनके आदी हो जाते हैं और फिर चाह कर भी उन्हें इससे निजात नहीं मिलती। सरकार को नशीली दवाओं की बिक्री रोकने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए।

सलीम जावेद, जामिया मिल्लिया इस्लामिया

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