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व्यवहार की स्वीकृति

‘घातक होता है दोहरा रवैया’ (लेख, 19 जुलाई) पढ़ा। एक तरफ तो समाज में सामंजस्य कायम करने के लिए हमें अपने व्यवहार में परिवर्तन के लिए कहा जाता है और दूसरी तरफ इसी बदलते व्यवहार के नकारात्मक प्रभाव सिद्ध होते हैं।

सांकेतिक फोटो।

‘घातक होता है दोहरा रवैया’ (लेख, 19 जुलाई) पढ़ा। एक तरफ तो समाज में सामंजस्य कायम करने के लिए हमें अपने व्यवहार में परिवर्तन के लिए कहा जाता है और दूसरी तरफ इसी बदलते व्यवहार के नकारात्मक प्रभाव सिद्ध होते हैं। अगर व्यक्ति के प्राथमिक व्यवहार की ही बात कर ली जाए तो यह कहां तक संभव है कि वह उसे स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सके! व्यक्ति के यथार्थ व्यवहार की प्रस्तुति पर उसे तुरंत उन आदर्शवादी मान्यताओं का सामना करना पड़ता है जो शायद आदर्शवादी नहीं हैं, पर चूंकि समाज ने उसे एक स्वीकृत मूल्य के रूप में बना दिया है तो व्यक्ति की मजबूरी है उसे मानने की और उसके अनुसार अपने व्यवहार को परिवर्तित करने की। अब फिर चाहे ऐसे में व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य का हनन हो जो उसे मनोवैज्ञानिक विषादों की ओर ले जाए। लेकिन वह खुद को परिवर्तित करेगा समाज में स्वीकृति प्राप्त करने के लिए। यह दोहरा व्यवहार किसी व्यक्ति या वर्ग भर की समस्या नहीं है, यह उन सब लोगों के साथ है जो इस बात से डरते है कि ‘लोग क्या कहेंगे’?

मनोविज्ञान कहता है कि इच्छाओं के दमन से अपराध की उत्पत्ति होती है, पर हमारी सामाजिक स्वीकृति इसकी परवाह कहां करती है। कभी परिवार के लिए तो कभी मित्र समूह के लिए तो कभी-कभी व्यावसायिक स्वीकृति के लिए हजारों लोग खुद के स्वभाव को दोहराते रहते हैं। रही बात खुद की सुनने की और प्राकृतिक (स्वाभाविक) होने की तो क्या इस बात की इजाजत हमें उस प्रकार से मिल पाती है, जिस प्रकार से इस मसले पर सैद्धांतिक प्रचार होते हैं? फर्क दिखता है कथनी और करनी का। किताबी और कानूनी मान्यता तो कई बार मिल जाती है, पर व्यवहारिक सच तो उससे कहीं दूर दिखता है।
’ऊषा चौधरी, इलाहाबाद, उप्र

विभाजन की सियासत

वर्तमान मे नेताओं द्वारा देश में धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करते हुए जो हिंसात्मक उन्माद फैलाया जा रहा है, वह जहर और विवाद दोनों का काम कर रहा है। यह जहर आतंकवाद, उग्रवाद और नस्लवाद से भी अधिक जहरीला है। चुनावों के समय नेताओं द्वारा अपनी जीत के लिए हर राज्य में धर्म और जातियों के नाम पर वोट-बैंक की खूनी राजनीति खेली जा रही है। धर्म-जाति के नाम पर राजनीति का बंटवारा कर आज के नेता जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों यानी रोटी, रोजगार और छत से भटकाना चाह रहे हैं। पिछले दिनों के दौरान देश में जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें ‘सौहार्दपूर्ण धार्मिक वातावरण’ को बिगाड़ने और हिंसात्मक घटनाओं को अंजाम देने के पीछे नफरत पैदा करने वाले भाषणों और बयानों का बड़ा हाथ रहा है।

देश के विभिन्न राज्यों मे हिंसात्मक राजनीति के चलते सैकड़ों बेकसूर लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा हैछ कुछ दशकों पहले देश की राजनीति की छवि बहुत ही साफ- सुथरी मानी जाती थी। आज की राजनीति के मायने बदल गए हैंछ कुछ लोग राजनीति को कमाई का जरिया मान बैठे हैं। अपराधों मे लिप्त लोगों के राजनीति मे प्रवेश से नेतागिरी के स्वरूप ही बदल गए हैं। अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ये नेता धर्म और जाति के नाम के साथ गुंडातत्त्वों का सहारा लेकर अपने क्षेत्रों मे दबदबा बनाए रखना चाहते हैं। धर्म और जाति की राजनीति को बंद करने की बड़ी जिम्मेदारी आज नेताओं की ही है। इसे खत्म कर ही वे इंसानियत के साथ समाज मे भाईचारे को जिंदा रखने में कामयाब हो पाएंगे।
’नरेश कानूनगो, गुंजुर, बंगलुरु, कर्नाटक

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