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चौपाल: निजीकरण की राह

निजीकरण रूपी साजिश पर देश की जनता की चुप्पी ही चंद उद्योगपतियों का वर्चस्व कायम करने और बाकी को दोयम या गुलाम बनाने की नीति में सहायक है। यह चुप्पी घातक साबित हो सकती हैं।

बदलाव जिस रफ्तार से हो रही है, उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि वह समय अब दूर नहीं होगा जब इतिहास में पढ़ाया जाएगा कि भारत की अंतिम सरकारी ट्रेन, अंतिम सरकारी बस कब चली या अंतिम सरकारी हवाई अड्डा और अंतिम सार्वजनिक उद्योग कौन-सा था आदि। किसी सरकारी उपक्रम या सरकारी संस्थान के निजीकरण होने पर आम जनता का चुप रहना सबके लिए भारी पड़ने वाला है, क्योंकि जब सारे स्कूल, सारे अस्पताल, सारे रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, बिजली, पानी, सब निजी हाथों में चला जाएगा, तब हमें उनकी मनमानी देखने की नौबत आएगी।

ध्यान रहे सरकार और सरकारी उपक्रमों का उद्देश्य होता है कम से कम मुनाफे में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सेवा पहुंचाना! जबकि निजी संस्थानों का उद्देश्य ही होता है कम से कम लागत में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। उदाहरण के रूप में आज निजी स्कूलों और निजी अस्पतालों का हाल देखा जा सकता है। अंदर घुसते ही पता चल जाएगा, लेकिन सरकार सरकारी व्यवस्था को ठीक करने के बजाय सब कुछ निजी हाथों में एक एक करके सौंपा जा रहा है।

निजीकरण रूपी साजिश पर देश की जनता की चुप्पी ही चंद उद्योगपतियों का वर्चस्व कायम करने और बाकी को दोयम या गुलाम बनाने की नीति में सहायक है। यह चुप्पी घातक साबित हो सकती हैं। हालांकि सब कुछ तेजी से हाथ से निकलता जा रहा है, लेकिन अगर बचे हुए वक्त के रहते अगर देश की सार्वजनिक संपत्तियों, रेल, शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, सरकारी विभागों को बचाने और बेरोजगारी दूर करने के लिए कदम नहीं उठाए गए तो इसका खमियाजा सबको उठाना पड़ सकता है।

कोरोना महामारी ने तो बखूबी आईना दिखाया कि मुसीबत के समय सरकारी कर्मचारी (डॉक्टर, पुलिस, सफाईकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी, लेखपाल, ग्राम सचिव आदि) और सरकारी परिवहन और सरकारी विभाग ही काम आए। इसलिए सरकार को चाहिए कि निजीकरण के चलन को समाप्त कर के अपना सरकारी व्यवस्था को ठीक करने पर ध्यान दे और बुनियादी बात शिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य का ढांचा मजबूत करने की ओर ध्यान दे।
’सत्यम सिंह, पटना, बिहार

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