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चौपालः किसान का दुख

हाल ही में देश भर के लाखों मजदूर-किसान-कामगार और महिलाओं ने दिल्ली में जोरदार तरीके से अपनी मांगें देश के सामने रखीं।

इससे पहले मार्च में भी लाखों किसानों ने महाराष्ट्र के नासिक से करीब एक सौ अस्सी किलोमीटर पैदल चल कर मुंबई के आजाद मैदान में भी इसी तरह की मांग रखी थी।

हाल ही में देश भर के लाखों मजदूर-किसान-कामगार और महिलाओं ने दिल्ली में जोरदार तरीके से अपनी मांगें देश के सामने रखीं। वे नारा लगा रहे थे कि हमें तेरे सत्ता के सियासी खेल का हिस्सा नहीं बनना… हमें हमारी परिश्रम का मेहनताना दे दो… और हमारी मांगें पूरी करो। बहरहाल, व्यापक जुटान से ज्यादा अहम यह बात थी कि लाखों किसानों के लिए कर्जमाफी, महंगाई, किसानों की उपज का उचित मूल्य, पेट्रोल-डीजल की कीमतें और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें जैसी मांगों पर जोर दिया गया।इससे पहले मार्च में भी लाखों किसानों ने महाराष्ट्र के नासिक से करीब एक सौ अस्सी किलोमीटर पैदल चल कर मुंबई के आजाद मैदान में भी इसी तरह की मांग रखी थी।

फिर जून 2018 में देश भर में जगह-जगह ‘गांव बंद किसान आंदोलन’ चला था, जिसमें लुधियाना, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा जैसे प्रमुख राज्यों ने तकरीबन दस दिनों तक शहरों को दूध, सब्जी, अनाज वगैरह की आपूर्ति बंद कर दी थी। उनकी मांग भी समान थी। दूसरी ओर, इसी तरह की मांग के साथ चले किसान आंदोलन में ही पिछले साल 6 जून 2017 को मध्यप्रदेश के मंदसौर में पुलिस की गोली से छह आंदोलनकारी किसानों की मौत हो गई थी।किसान आंदोलन के तर्क से यही निकल कर आता है कि समय-समय पर सभी सरकारें वादे तो करती हैं, लेकिन किसानों के दुख से उनका कोई वास्ता नहीं होता। अगर किसानों के मांगों को लेकर सरकारें ध्यान दें तो समाधान काफी हद तक निकल सकता है और किसानों को उनका अधिकार मिल सकता है। सभी पहलुओं पर सरकार को चाहिए कि वह बाकी दलों और राज्य सरकारों से मिल कर किसानों की समस्याओं का समाधान निकालने की ठोस योजना पर काम करे, ताकि आत्महत्या करते किसानों की जान बचाई जा सके।

साहित्य मौर्या, जामिया मिल्लिया, दिल्ली

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