मणिपुर का मर्म

जम्मू-कश्मीर सहित देश के पूर्वोत्तर राज्यों में चरमपंथियों और आतंकवादियों की दुस्साहसिक कार्रवाई आंतरिक सुरक्षा के लिए चिंताजनक बन गई है।

सांकेतिक फोटो।

जम्मू-कश्मीर सहित देश के पूर्वोत्तर राज्यों में चरमपंथियों और आतंकवादियों की दुस्साहसिक कार्रवाई आंतरिक सुरक्षा के लिए चिंताजनक बन गई है। राष्ट्रीय रक्षा यज्ञ में सेना और पुलिस के जवानों की आहुति में निरंतर वृद्धि होते रहना देश के लिए गंभीर सवाल है जो हमारी खुफिया तंत्र की कलई भी खोल रही है। जब से मणिपुर राज्य अस्तित्व में आया, तब से कई विद्रोही संगठनों का जन्म हुआ, जिनकी मुख्य मांगों में मणिपुर को अलग देश के रूप में स्थापित करने की विभाजनकारी मांग रही है। राज्य में यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट प्रथम उग्रवादी संगठन ने 1964 में आकार ग्रहण किया और कालांतर में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, पीएल कांग्लिपाव एवं कांग्लिपाव कम्युनिस्ट पार्टी जैसे अतिवादी संगठनों ने राज्य के भीतर अपना वर्चस्व बनाने में अहम भूमिका भी निर्मित की।

देर से ही सही, राज्य और केंद्र सरकार ने सितंबर 1980 में राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित कर दायित्व की पूर्ति कर दी। आज भी राज्य चालीस वर्षों से शांति की मुख्यधारा से विलग हो अराजकता की अग्नि की भेंट चढ़ चुका है। जनवरी 2021 से राज्य में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम की अवधि को विस्तारित किया गया है। यों कहें कि ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया। आखिर मणिपुर सहित अन्य अशांत राज्य नगालैंड जैसे क्षेत्र को सामान्य जीवन की धरा पर उतारने में किए गए उपायों के फलाफल की समीक्षा केंद्र क्यों नहीं कर रही है।

हाल में कर्नल विप्लव सहित अन्य की शहादत ने सुरक्षा प्रबंधों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मणिपुर में सक्रिय उग्रवादी तत्त्वों का तालमेल चीन से होने के समाचार भी आते रहते हैं, जिस पर सरकार को गंभीरतापूर्वक कारवाई करने की जरूरत है। हालांकि सुरक्षा बलों को उग्रवादियों के सफाए में सफलता मिल भी रही है, लेकिन उन्हें घातक हमले का शिकार भी होना पड़ रहा है। देश के बाहरी दुश्मनों से निपटने की जगह देश के भीतर आतंक के मुकाबले के लिए जारी रणनीति में प्रभावी कारवाई करनी होगी।
’अशोक कुमार, पटना, बिहार

हवा में जहर

आजकल खासतौर पर दिल्ली में प्रदूषण की एक बड़ी समस्या बन चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर संज्ञान लिया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 76 फीसद प्रदूषण वाहनों और कारखानों से होता है। धान जलाने से केवल चार फीसद प्रदूषण होता है। दिल्ली में सांस लेना बहुत मुश्किल है। प्रदूषण श्वसन प्रणाली पर हमला करता है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो बीमारी और भी गंभीर होगी।

बच्चे राष्ट्र का भविष्य हैं, अगर ये मासूम गंभीर बीमारियों की चपेट में हैं तो उनका वहां भविष्य अंधकारमय होगा। यह समस्या कोई नई नहीं है। यह कई वर्षों से चल रही है। इस समस्या को हल करने के लिए टिकाऊ समाधान किया जाना चाहिए। इसके लिए फैक्ट्रियों में प्रदूषण मुक्त यंत्र लगाए जाएं, सार्वजनिक परिवहन पर अधिक से अधिक जोर दिया जाए, ताकि वाहनों का भार कम हो सके। ये उपाय तत्काल किए जाएं।
’नरेंद्र शर्मा, जोगिंदर नगर, मंडी

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