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चौपालः दूसरा दरवाजा

सरकार की तरफ से प्रशासनिक सेवाओं में निजी क्षेत्र के प्रवेश का प्रस्ताव दिया गया है, जिसमें भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्ति के लिए संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी।

Author June 14, 2018 5:27 AM
निजी क्षेत्रों के लिए रास्ते खोल देने से सरकारी योजनाओ का क्रियान्वयन ठीक ढंग से होना शुरू हो जाएगा, यह आकलन सही नहीं है।

दूसरा दरवाजा

सरकार की तरफ से प्रशासनिक सेवाओं में निजी क्षेत्र के प्रवेश का प्रस्ताव दिया गया है, जिसमें भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्ति के लिए संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी। आखिर संस्थाओं के नियमों से खिलवाड़ की आवश्यकता क्यों है? इस पहलकदमी का प्रस्ताव व्यावहारिक नहीं लग रहा है, क्योंकि निजी क्षेत्र से आने वाले व्यक्ति की जवाबदेही तय करना मुश्किल होगा। यह सही है कि आज के दौर में सरकार और प्रशासन चलाना आसान नहीं है। इसके लिए ऐसे लोगों की नियुक्ति होनी चाहिए, जिन्हें कार्यक्षेत्र की विशेष दक्षता हो। लेकिन सरकार जो व्यवस्था करने जा रही है, उसमें अपने नजदीकी, जानकारों और रिश्तेदारों को प्राथमिकता देने का खतरा बढ़ जाएगा। गैरसरकारी व्यक्ति महत्त्वपूर्ण पद पर बैठते हैं तो वे कॉन्टैÑक्ट खत्म होने के बाद निजी कंपनियों से जुड़ कर सरकारी व्यवस्था की कमियों का फायदा उठा सकते हैं। सरकार के अहम फैसलों की जिम्मेदारी वैसे लोगों मिलनी चाहिए, जो विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए शीर्ष पदों तक पहुंचे हैं और जो किसी के प्रति जवाबदेह हों।

जाहिर है, सरकार को फैसले से पहले ऐसे बिंदुओं पर व्यापक स्तर पर चर्चा करनी चाहिए। निजी क्षेत्रों के लिए रास्ते खोल देने से सरकारी योजनाओ का क्रियान्वयन ठीक ढंग से होना शुरू हो जाएगा, यह आकलन सही नहीं है। इस फैसले का असर मौजूदा व्यवस्था पर भी पड़ना तय है, क्योंकि फैसले के बाद आइएएस काडर में पदोन्नति को लेकर अनिश्चितता का माहौल हो जाएगा। सरकार को कार्यक्षमता के प्रदर्शन के आधार पर अधिकारियों को पदोन्नत कर आगे बढ़ाना चाहिए और यूपीएससी की परीक्षा पास किए विद्यार्थियों को विषय की योग्यता या विभाग में रुचि रखने वाले लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

’महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

गौरैया का जीवन

पिछले कुछ समय से गौरैया का अस्तित्व खतरे में देखा जा रहा है। अब वे कहीं-कहीं और कभी-कभार देखी जाती है। हालांकि अभी भी समय है कि हम करीब पचासी फीसद तक कम होकर विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी इस चिड़िया की विलुप्ति के कारणों का जल्दी समाधान करें। वैज्ञानिकों को ऐसे सूचना-तंत्र का विकास करना चाहिए, ताकि दूरस्थ व्यक्ति से संवाद भी हो और प्रकृति के इस अनुपम जीव पर भी कुछ दुष्प्रभाव न पड़े, नदियों, तालाबों का पानी प्रदूषण मुक्त करने का कार्य तीव्र और युद्ध-स्तर पर हो, हरे-भरे पेड़ों को जहां तक संभव हो, कम से कम काटा जाए। यानी सही मायने में वृक्षारोपण और उनका पालन हो, वृक्षारोपण के नाम पर केवल नाटक न हो।

घरों में इन नन्हीं चिड़िया के घोंसले के लिए एक ऊंचाई पर छोटा-सा स्थान अवश्य छोड़ा जाए या कम से कम एक लकड़ी, गत्ता, टिन, बांस या किसी भी डिब्बे को घोंसले का रूप देकर छज्जे आदि के नीचे टांग दिया जाय, जो बारिश और गौरैया के दुश्मनों आदि से सुरक्षित हो। गौरैयों को बचाने के लिए वर्तमान सरकारें और देश के संवेदनशील लोग अगर गंभीर हैं, तो बाघों को बचाने के लिए बनाए गए अभयारण्यों की तरह कम आबादी वाले इलाकों में कम से कम पांच-सात वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को मोबाइल टावरों और रेडिएशन से मुक्त क्षेत्र बनाए जाएं। गौरतलब है कि गौरैयों के विलुप्तिकरण का सबसे बड़ा कारण मोबाइल टावरों से निकलने वाली घातक रेडिएशन किरणें ही हैं।

निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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