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चौपाल: जाति की राजनीति

पिछले दो लोकसभा चुनावों में बिहार की जनता ने जात-पात से ऊपर उठ कर मतदान किया था। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में खुल कर जातीय समीकरण के आधार पर वोट पड़े थे।

Author Updated: October 19, 2020 4:25 AM
JDU RJD BJP LJPतस्वीर में जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार, हम प्रमुख जीतनराम मांझी, एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव।

पिछले दो लोकसभा चुनावों में बिहार की जनता ने जात-पात से ऊपर उठ कर मतदान किया था। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में खुल कर जातीय समीकरण के आधार पर वोट पड़े थे। इस बार का विधानसभा चुनाव में भी टिकट बंटबारे में सभी राजनीतिक दलों ने जातीय समीकरण का विशेष ध्यान रखा है। इस जातीय राजनीति ने यहां वंशवाद का बोलबाला कर दिया है। राजद और एलजेपी जैसी पार्टियां वंशवाद और जातीय राजनीति की देन हैं।

इस चुनाव में एनडीए और महागठबंधन आमने सामने हैं। महागठबंधन में बंधन कम है और गांठ अधिक हैं, इसलिए इस महागठबंधन से हम, रालोसपा और वीआइपी पार्टी अलग हो गई हैं। लोजपा द्वारा सिर्फ जद (एकी) और हम के खिलाफ प्रत्याशी उतारने से यह चुनाव बेहद रोचक हो गया है। बिहार में मतदाताओं को भय दिखाकर वोट हासिल करने की परंपरा है।

मुसलिम समुदाय के मतदाताओं को भाजपा का डर दिखाया जाता है, तो सामान्य वर्ग के मतदाताओं को लालू प्रसाद का डर दिखाया जाता है। विकास का मुद्दा गौण हो जाता है। जातीय समीकरण के आधार पर भी एनडीए गठबंधन का पलड़ा भारी पड़ रहा है।
’हिमांशु शेखर, केसपा, गया

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