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मत की ताकत

वोट जनता की ताकत है’ जैसी न जाने कितनी पंक्तियां और नारे मतदान के महत्त्व को दर्शाते दिखाई देते हैं।

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ईवीएम। फाइल फोटो।

‘वोट जनता की ताकत है’ जैसी न जाने कितनी पंक्तियां और नारे मतदान के महत्त्व को दर्शाते दिखाई देते हैं। जब भी चुनाव करीब आते हैं, तो ये शब्द गली-शहरों के दीवारों पर दर्ज नजर आने लगता है। मतदान से आशय है जनता अपने मत को लोकतांत्रिक गंतव्य तक पहुचाए यानी मतदान जनता की एक ऐसी शक्ति है जो लोकतांत्रिक गणराज्य का अतिविशिष्ट और अभिन्न अंग है।

अगर हम भारत की बात करें तो वर्तमान स्थिति में मतदान को लेकर जनजागरूकता अभियान जरूर चलाया जा रहा है, पर संवैधानिक रूप से मतदान की अनिवार्यता पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। जब कभी मतदान की बातें होती है, तो कई तर्क सामने आते हैं। कइयों का कहना होता है कि मतदान करना आवश्यक है तो कई कहते हैं कि एक मत भी बहुत महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है तो कई उसकी अनिवार्यता न होने के कारण उसका आह्वान करना भी सही नहीं समझते। दूसरी ओर, परिस्थिगत कारणों के चलते भी कुछ लोग मतदान की अनिवार्यता की दलील को खारिज करते हैं।

मतदान की अनिवार्यता जरूरी है, लेकिन अनिवार्यता संविधानिक तौर पर नहीं, बल्कि जागरूकता से आनी चाहिए। अक्सर यह देखा गया है कि भारत में मतदाताओं के फीसद में हर अगली बार बढ़ोतरी हो रही है। सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में बिना अनिवार्यता के 67 प्रतिशत मत आना वाकई गौरव की बात है। कमी कानूनों की नहीं, कमी जागरूकता की है जो धीरे-धीरे कम होती दिखाई दे रही है। जागरूकता से लाई गई अनिवार्यता से लोकतंत्र का लचीलापन बरकार रहेगा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होने बचेगा। साथ ही इस तरह से किया गया मतदान सही मायने में सफल रहेगा।

  • राखी पेशवानी, भोपाल, मप्र

जनता की लाचारी

दलबदलुओं के लिए कुछ न कुछ सजा का प्रवधान होना चाहिए। सत्ता की लोलुपता या लाभ लेने के लिए चुनाव से पहले दल-बदल का सिलसिला एक-दो महीने तक चलता है, जिसका खामियाजा मतदाता और दल के सच्चे सिपाही को भुगतना पड़ता है, क्योंकि दल बदलने वाले जीतें या हारें, सत्ता सुख से वंचित नहीं होते, बल्कि किसी न किसी पद से नवाजे ही जाते हैं। दलबदलुओं पर विश्वास करने वाले मतदाता और दल, दोनों ही धोखे के शिकार होते हैं और इस तरह लोकतंत्र कमजोर होता है। ‘दल-बदल का खेल’ (संपादकीय, 24 जनवरी) में भी उल्लेख है कि बढ़ते दल-बदल से नैतिक शुचिता का क्षरण तथा जनादेश का अनादर हो रहा है।

दल-बदल आसान ही नहीं, लाभप्रद भी है, क्योंकि व्यक्ति को सजा नहीं, बल्कि पुरस्कृत होता है। आवश्यकता है दलबदलुओं को अपात्र घोषित करने, दल-बदल की सीमा तय करने, वेतन, भत्तों से या सदन में मतदान से कुछ समय तक वंचित रखने, संबंधित कानून बनाने, अन्यथा सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग भी एक सीमा से आगे कठोर कदम नहीं उठा सकते।

  • बीएल शर्मा ‘अकिंचन’, उज्जैन, मप्र

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