ताज़ा खबर
 

चौपालः किसानों की बदहाली

अपनी मांगों को लेकर कभी पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु सहित देशभर के किसानों को सरकारों को कुंभकर्णी नींद से जगाने के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होना पड़ता है।

Author October 4, 2018 3:04 AM
अगर किसान अपने हक के लिए देर-सवेर सड़कों पर ही उतरते रहे तो वो अपनी खेतीबाड़ी में सुधार या पैदावार बढ़ाने के बारे कैसे ध्यान देंगे?

किसानों की बदहाली

अपनी मांगों को लेकर कभी पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु सहित देशभर के किसानों को सरकारों को कुंभकर्णी नींद से जगाने के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसा कोई साल नहीं जाता जब किसानों की खुदकुशी की घटनाओं की खबरें न आती हों। कृषि प्रधान देश भारत के लिए यह जरा भी उचित नहीं है। जब तक किसानों के हरेक मुद्दे पर राजनीति होती रहेगी, तब तक किसानों की किसी भी समस्या का हल निकलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि आजादी के सात दशक बाद भी किसानों की समस्याओं का हल निकल पा रहा? किसानों की समस्याएं ऐसी भी नहीं हैं कि जिनका हल निकालना सरकारों के लिए एवरेस्ट पर चढ़ाई की चुनौती जैसा हो। सरकारें जानबूझ कर किसानों के मुद्दों को सुर्खियों में बनाए रखना चाहती हैं, ताकि इन मुद्दों पर राजनीति की रोटियां सेकी जाती रही। किसानों के प्रति सरकारों की दोगली नीतियां और वोट बैंक की राजनीति एक दिन दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देश के लिए ऐसी नौबत ला देगी कि यहां कृषि न के बराबर होने लगेगी और तब कहीं ऐसी नौबत न आ जाए की भारत को अनाज और सब्जियों का भी अयात करने को मजबूर होना पड़ जाए।

अगर किसान अपने हक के लिए देर-सवेर सड़कों पर ही उतरते रहे तो वो अपनी खेतीबाड़ी में सुधार या पैदावार बढ़ाने के बारे कैसे ध्यान देंगे? सरकार को किसानों के लिए बनाई गई योजनाओं की उन खामियों पर विचार करना चाहिए, जो किसानों के कल्याण में बाधक बन जाती हैं। योजनाएं त्रुटिमुक्त होंगी, तभी किसानों के लाभदायक साबित होंगी और किसानों की हर समस्या का समाधान हो सकेगा, उनको उनका हक मिल सकेगा। महात्मा गांधी ने किसानों को भारत की आत्मा कहा था। लेकिन आज किसानों की समस्याओं पर राजनीति करने वाले ज्यादा और उनकी समस्याओं की तरफ ध्यान देने वाले कम हैं। किसानों की खराब हालत के लिए भ्रष्टाचार भी जिम्मेवार है, तभी तो जरूरतमंद किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है। सरकारों को इस तरफ भी गंभीरता से ध्यान देना होगा।

राजेश कुमार चौहान, जलंधर।

हकीकत देखें

पिछले चार सालों में लोकसभा के 552 और राज्यसभा के 250 सांसदों के वेतन और भत्तों पर कुल खर्च 19.97 अरब रुपए खर्च हुए। इस हिसाब से इनमें से प्रत्येक पर पांच लाख बानवे हजार छह सौ इक्यावन रुपए प्रतिमाह खर्च हुए। वैसे तो वतर्मान समय में किसान को उसकी फसल की लागत मूल्य भी नहीं मिल पा रही है, फिर भी एक सरकारी आंकड़े के अनुसार एक औसत भारतीय किसान की औसत सामान्य आमदनी मात्र तीन हजार रुपए मासिक है। ऐसे में मूल प्रश्न यह है कि संसद के वातानुकूलित कमरों में बैठ कर किसानों के बारे में चर्चा करने और बयान देने वाले केवल तीन हजार रुपए में एक महीने गुजारा करके दिखाएं। तब उन्हें किसानों के जीवन की सच्चाई नजर आएगी और तभी वे वास्तविक स्थिति और किसानों के दर्द को समझ पाएंगे। अगर कृषि व्यवस्था ढह गई तो भुखमरी फैलते देर नहीं लगेगी और कोई उद्योगपति या सरकार देश को बचा नहीं पाएगी। इसलिए अभी भी संभल कर भविष्य की नीतियों को तय करने का समय है।

निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App