प्रदूषण का प्रकोप

पिछले दिनों वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए दिल्ली सरकार ने लगभग आधा महीने का प्रदूषण आपातकाल घोषित किया।

सांकेतिक फोटो।

पिछले दिनों वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए दिल्ली सरकार ने लगभग आधा महीने का प्रदूषण आपातकाल घोषित किया। अब दिल्ली सरकार के आदेश के अनुसार 29 नवंबर तक स्थितियों के पुनर्बहाल होने की बात कही गई है। इस आपातकाल के दौरान शिक्षण संस्थानों में अवकाश, सरकारी कार्यालयों में दो तिहाई कर्मचारियों को घर से कार्य करने, निर्माण कार्यों को निश्चित समय के लिए रोकने आदि के निर्देश दिए हैं।

भले सरकार का यह प्रयास लोकहित में है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम आर्थिक सामाजिक रूप से नुकसानदेह हैं। पहले ही कोरोना की मार के चलते शिक्षा से विद्यार्थियों की, कार्यालयों से कर्मचारियों की दूरी बढ़ी हुई है; अनेक रूझानों में यह बात कही जा रही कि समय रहते उचित प्रयास नहीं हुए तो बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बढ़ सकती है। इसी प्रकार कर्मचारियों की कार्य क्षमता, कार्य गुणवत्ता आदि में कमी महसूस की जाने लगी है। ध्यान देने योग्य है कि मनोविज्ञान के अनुसार किसी कार्य को करते रहना, जोकि लगभग इक्कीस दिनों में आदत का रूप ले लेता है; इस प्रकार पुरानी व्यवस्थाओं के पुन: पटरी पर लाने के लिए की गई क्षतिपूर्ति भारी पड़ेगी।

अकसर ऐसा देखा जाता है कि भारत इस तरह की समस्याओं के प्रति स्थितियों के गंभीर हो जाने के बाद बचाव की रणनीति अपनाता है, जबकि समस्याओं के जन्म के विरुद्ध प्रयास यानी न्यूनीकरण की रणनीति पर पर्याप्त कार्य का अभाव दिखता है। इसके बावजूद कुछ रणनीतियां सरकार की काबिले-तारीफ हैं, जैसे कि स्वच्छ भारत मिशन, जिसके चलते स्वच्छता ने मानव मस्तिष्क में जगह बनानी शुरू कर दी है, जो लोगों को अनेक बीमारियों से बचाते हुए आर्थिक समृद्धि की ओर ले जाएगा। इसलिए प्रदूषण जैसी समस्याओं के लिए इसी तरह की रणनीति की आवश्यकता है, जिसने सरकार के साथ लोगों की भी व्यापक भागीदारी हो।
’मोहम्मद जुबैर, कानपुर

तेल पर खेल

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के बढ़ते दामों के मद्देनजर अमेरिका ने एक पहल की है कि उस सहित भारत, ब्रिटेन, चीन, जापान आदि देश अपने आपातकालीन तेल भंडारों का उपयोग करें, ताकि तेल उत्पादक देशों पर कीमतें कम करने का दवाब पड़े। दुनिया भर के बड़े उपभोक्ता देश लगभग नब्बे दिनों का आपातकालीन भंडार रखते हैं। इससे हो सकता है कि फिलहाल कच्चे तेल के दामों में कमी आ जाए, लेकिन दीर्घावधि में यह भारत के लिए नुकसानदायक होगा। 2020 में अमेरिका एक पेट्रोलियम निर्यातक देश था, जबकि भारत अपनी जरूरत का लगभग अस्सी प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। मतलब, आपातकालीन स्थितियों में अमेरिका तो घरेलू उत्पादन से काम चला लेगा, लेकिन भारत का क्या होगा?

कच्चे तेल के में बढ़ोत्तरी की एक वजह अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हैं। वह अगर ये प्रतिबंध हटा ले, तो तेल के दाम वैसे ही कम हो जाएंगे। अमेरिका भविष्य के मद्देनजर तेल का एक बड़ा खेल खेलना चाहता है, क्योंकि जब नब्बे दिन का आपातकालीन भंडार खत्म हो जाएगा, तब भारत सहित पूरी दुनिया फिर से तेल उत्पादक देशों, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, के रहमो-करम पर होगी। इसलिए आंख मूंद कर अमेरिका के तेल के खेल का मोहरा बनने से पहले भारत को दोबारा सोचना होगा।
’बृजेश माथुर, बृज विहार, गाजियाबाद

पढें चौपाल समाचार (Chopal News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।