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सुधार की दरकार

हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यह गर्व की बात है कि चुनावों के माध्यम से ही हम सरकारों को शांतिप्रिय तरीके से बदलते रहते हैं..

Author नई दिल्ली | Published on: December 26, 2015 12:01 AM
भारत निर्वाचन आयोग

हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यह गर्व की बात है कि चुनावों के माध्यम से ही हम सरकारों को शांतिप्रिय तरीके से बदलते रहते हैं। यह चुनाव आयोग की स्वायत्तता, सजगता, सक्रियता और सतर्कता का ही परिणाम है कि कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक की तमाम भौगोलिक विषमताओं और विविधताओं के मध्य चुनाव प्रक्रिया का संचालन सुचारु, स्तरीय, निष्पक्ष और विश्वसनीय बना हुआ है तथा मतदान प्रतिशत में वृद्धि हो रही है।

जनतांत्रिक प्रणाली में चुनी गई सरकार को जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए माना जाता है। आज जब हम आजादी के सातवें दशक में चल रहे हैं इस प्रणाली को और अधिक जनोन्मुखी बनाने तथा जनभागीदारी को बढ़ाने के लिए विचार करने की जरूरत है। क्या जनतंत्र में जनता की भागीदारी सिर्फ वोट देने तक ही सीमित है? क्या निर्णय प्रक्रिया में उनकी कोई भागीदारी नहीं होनी चाहिए? जनता को निर्णय प्रक्रिया या क्रियान्वयन में किस तरह से जोड़ा जा सकता है, इस पर विचार और योजना बनाने की आवश्यकता है।

विगत लोकसभा चुनाव को देखें तो महसूस होता है कि चुनाव बहुत खर्चीले और महंगे होते जा रहे हैं, दिवंगत गोपीनाथ मुंडे ने सार्वजनिक तौर पर चुनाव में आठ करोड़ रुपए खर्च करने की बात स्वीकारी थी। क्या सामान्यजन इस तरह के चुनाव में उतरने की हिम्मत कर सकता है? चुनाव खर्च में जो नैगमिक घराने या व्यावसायिक घराने सहयोग करेंगे वे अपने व्यावसायिक हितों में इस सहयोग को नही भुनाएंगे? क्या ऐसी परिस्थितियों में समावेषी नीति और निर्णय लिए जा सकेंगे? क्या देश की एक प्रतिशत आबादी के पास सत्तर प्रतिशत संपदा और निन्यानबे प्रतिशत आबादी के पास तीस प्रतिशत संपदा की विषमता की खाई का इस चुनावी गणित से कोई रिश्ता नहीं है? विषमता को कम करने, समावेषी विकास और न्यायपूर्ण वितरण के लिए सामान्यजन की चुनावों में भागीदारी बढ़ाने के लिए निम्न चुनाव सुधार पर गंभीरता और तत्परता से विचार करना आवश्यक है।

लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों। चुनाव खर्च, वहन एक पृथक चुनाव कोष से हो, राज्य और केंद्र सरकारें उसके लिए फंडिंग करें और चुनाव कोष में व्यक्तिगत, व्यावसायिक और नैगमिक संस्थानों को आर्थिक सहयोग की राशि को आयकर से शत-प्रतिशत छूट प्रदान की जाए। चुनाव में व्यक्तिगत और पार्टीगत खर्च पूर्णत: प्रतिबंधित हों। प्रत्याशियों को एकमंच से अपने विचार और कार्ययोजना रखने और मतदाताओं को अपनी बात कहने का अवसर मिले। चुनाव पूर्व अनुमानों के आकलन और उनके प्रसारण पर पूर्ण प्रतिबंध हो। अपराधी, भ्रष्टाचारी तथा टैक्स और बैंकऋण चूककर्ता के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध हो।

चुनाव प्रचार में भाषा के गरिमामय प्रयोग और बयानों की सन्यमितता सुनिश्चित हो तथा विद्वेष, नफरत फैलाने वालों के प्रति प्रभावी और ठोस कार्रवाई के लिए चुनाव आयोग को अधिकार संपन्न बनाया जाए। ऐसे उपायों पर अगर ध्यान दिया जाए और चुनाव आयोग इन पर सख्ती से अमल करे तो चुनावों में कम खर्चों से चुनाव कराए जा सकते हैं। (सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर)

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कैसा आचरण
भविष्य में संसद के दोनों सदनों का कार्य निर्बाध गति से चले, इसके लिए किसी कड़े नियम को बनाना अब लाजिमी हो गया है। संसद के दोनों सदनों में अगर संसदीय-कार्य में माननीय सांसद बाधा डालते हैं अथवा संसद को चलने नहीं देते हैं जिसके कारण अति महत्त्वपूर्ण जनहित संबंधी बिल पारित नहीं हो पाते या फिर संसद को शोर-शराबे के कारण बार-बार स्थगित करना पड़े तो ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ सिद्धांत के अनुसार सांसदों के वेतन में कटौती होनी चाहिए। जनता के पैसे का यों अपव्यय हमारे गरीब देश के साथ बहुत बड़ा मजाक है। माना जा रहा है कि संसद-सत्र के दौरान एक-एक मिनट पर लाखों/ करोड़ों का खर्चा आता है। निजी क्षेत्र की तरह ही सांसदों को भी कार्यनिष्पादन के प्रति उत्तरदायी बनाना आवश्यक है। अगर ऐसा होता है तो देश के विकास को गति अवश्य मिलेगी। (शिबन कृष्ण रैणा, अलवर)

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बातचीत का रास्ता
भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत को लेकर राजनीतिक गलियारा गरमाया हुआ है। सरकार के रवैये पर सवालिया निशान खड़े किए जा रहे हैं, तथ्यों को देखें तो भारत चाह कर भी बहुत दिनों तक पाकिस्तान से बातचीत बंद नहीं कर सकता, क्योंकि जब तक पाकिस्तान भारत को जमीनी रास्ता नहीं देता, तब तक हम अपनी पकड़ मध्य एशिया पर नहीं बना पाएंगे और आर्थिक प्रतिस्पर्धा में चीन से काफी पीछे छूट जाएंगे। पाकिस्तान की सरकार के साथ भी अपनी मजबूरियां हैं, वहां चुनी हुई सरकारों के बजाय फौज का शासन ज्यादा रहा है। फौज भारत विरोध, कश्मीर और विद्वेष के आधार पर पाकिस्तान को एकजुट रखती है। भारत की राजनीतिक प्रभाव के बल पर फौज ने धीरे-धीरे इतने अधिक निहित स्वार्थ पैदा कर लिए हैं कि कोई सरकार उसे छूने तक की हिम्मत नहीं कर पाती।

जब तक वहां की सरकार पूरी ताकत के साथ बिना किसी दखल के अपने फैसले नहीं लेती तब तक इन दोनों देशों के रिश्तों की दरार को भरा नहीं जा सकता। भारत पाक के मधुर रिश्ते ही इन दोनों देशों के व्यापार और भाईचारे को नया आयाम दे सकते हैं। (सागर आनंद, एमसीयू, भोपाल)

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पढ़ाई के अलावा
आज समाज किताबी शिक्षा पर इतना ध्यान दे रहा है कि इसके कारण वह अपने बच्चों को अपनों से दूर किसी हॉस्टल में रखता है जिसके कारण बच्चों में कहीं न कहीं शिष्टाचार की कमी हुई है यह आज के समाज में बखूबी देखा जा सकता है। बच्चे अपनी संस्कृति और संस्कार को भूलते जा रहे हैं। आज इस किताबी ज्ञान के कारण बच्चे भूल गए हैं कि समाज में कैसे व्यवहार करना है। शिष्टाचार बच्चे के अंतर्गत समाज को देखने का नजरिया पैदा करता है। पर आज के समय में कहीं न कहीं यह सब ओझल-सा नजर आ रहा है। (अभिषेक शुक्ला, दिल्ली विवि, दिल्ली)

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