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खुदकुशी पर सियासत

हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या पर जिस तरह सियासत हो रही है, वह चिंता का विषय है। पार्टियों ने इस मुद्दे को अपनी सुविधा के अनुसार दलित और ओबीसी के बीच उछालना शुरू कर दिया है।

Author नई दिल्ली | January 26, 2016 1:40 AM
नई दिल्ली में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के खिलाफ प्रदर्शन करते युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता। (पीटीआई फाइल फोटो)

हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या पर जिस तरह सियासत हो रही है, वह चिंता का विषय है। पार्टियों ने इस मुद्दे को अपनी सुविधा के अनुसार दलित और ओबीसी के बीच उछालना शुरू कर दिया है। कोई भी रोहित की समस्या का जिक्र नहीं कर रहा है। जब कोई छात्र आत्महत्या करता है और वह किसी जाति विशेष या समुदाय से है तो सब आगे बढ़ कर विरोध करने लगते हैं, क्योंकि वहां उन्हें अपनी राजनीति चमकाने का अवसर दिखता है। पर अगर वही छात्र आत्महत्या से पहले शिक्षण संस्थान की कमियों को उजागर करता है, तो उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता।

रोहित की आत्महत्या से जिस तरह विश्वविद्यालय की कमियां उजागर हुई हैं, उससे शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठे हैं। उन सब लोगों से पूछा जाना चाहिए कि तब वे कहां थे, जब छात्रों को हॉस्टल से निकाला गया? तब कहां थे जब छात्रों को शोधवृत्ति मिलने में समस्या हो रही थी? छात्रों के हित में बात करने वाली ये पार्टियां वोट के लिए चुनाव में बड़ी-बड़ी बातें करती हैं और अपने को छात्रों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में लग जाती हैं। इस मामले में पक्ष से लेकर विपक्ष तक सब पर सवाल उठ रहे हैं।

सरकार पर सवाल उठ रहे हैं कि जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय को इस मामले की जानकारी थी तो उसने कार्रवाई क्यों नहीं की और आखिर में जब मंत्रालय के पास एक बार फिर पूरा मामला आया है तब वह क्यों पक्ष विशेष को बचाने का प्रयास कर रहा है? सवाल विपक्ष पर भी उठ रहे हैं कि हैदराबाद के समय तो वे सब अपना काफिला लेकर पहुंच गए, पर मालदा के समय इन लोगों की नींद क्यों नहीं टूटी? ये कोटा में आत्महत्या करने वाले छात्रों पर क्यों नहीं कुछ बोलते? पक्ष हो या विपक्ष, सब आने वाले चुनाव की जमीन तैयार कर रहे हैं। अगर पार्टियां इस मुद्दे को छात्रों की समस्या के रूप में उठातीं तो शायद किसी को कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन जब वे इस गंभीर मुद्दे का उपयोग अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए करती हैं और इसे एक जाति विशेष से जोड़ कर कर उठाती हैं तो वह देश और समाज दोनों के लिए घातक होता है। (सुप्रिया सिंह, छपरा, बिहार)

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पत्रकारिता का महत्त्व
दिनेश कुमार ने अपने लेख ‘सरोकार की पत्रिकाएं’ (24 जनवरी) में अच्छी तरह से भारतीय पत्रकारिता के विकास में लघु पत्रिकाओं के अवदान को सामने रखा है। एक समय भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में पत्रिकाओं का योगदान बेहद महत्त्वपूर्ण था। अगर विधिवत मूल्यांकन किया जाए तो नब्बे का दशक जहां एक ओर मंडल के कारण चर्चित रहा, तो दूसरी ओर सोवियत संघ के विघटन और उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण भी जाना जाता है। इन समस्त स्थानीय, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और अस्मितामूलक विमर्शों को लघु पत्रिकाओं ने व्यापक रूप से उभारा है।

हंस, पहल, तद्भव और समयांतर जैसे कुछ गिनी-चुनी ऐसी पत्रिकाएं हैं जो वास्तव में सामाजिक सरोकार को अपना मुख्य ध्येय मानती हैं। जरूत इस बात की है कि इनके प्रसार को और बढ़ाया जाए, ताकि लोक संस्कृति से कटी हुए पत्रकारिता को फिर से जन-जागरण का माध्यम बनाया जा सके। (सोनम, विजय नगर, दिल्ली)

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रेल का खेल

तेल का खेल तो सबने देख लिया, जिसमें विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम कम होने पर भी उपभोक्ताओं को कोई खास राहत नहीं मिल पाई, जबकि सरकार को अच्छा लाभ हुआ और राजकोष भरता गया। इसके बावजूद देश में कोई विकास कार्य दिखाई नहीं दिया। इससे जनता निराश है। तेल के खेल के बाद अब रेल का खेल भी सभी के सामने है, जिसमें रेल किराए तो खूब बढ़ा दिए गए हैं, मगर रेल यात्रियों को सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। आज भी यात्री जान जोखिम में डाल कर सफर करने को मजबूर हैं, क्योंकि रेलों में उस हिसाब से डिब्बे ही नहीं हैं। यही नहीं जनसुविधाओं और सुरक्षा आदि का भी कोई प्रबंध नहीं है।

लोकल ट्रेनों में तो छोटे दुकानदारों और मजदूर तबके के लिए सब्जियां आदि और अन्य सामान लाने-ले जाने की भी कोई उपयुक्त व्यवस्था नहीं है। इनसे उचित और अति सुगम टिकट व्यवस्था से रेलवे को काफी आय हो सकती है, जो भ्रष्ट कर्मचारियों की जेब में जाती रही है। स्टेशनों पर लाइनें पार करने के लिए छोटे-छोटे भूमिगत रास्तों और टिकट काउंटरों की सख्त जरूरत है। रेलवे की काफी जमीन पर अवैध कब्जों से गंदगी फैली रहती है। इन पर सरकार को जल्द कार्य करने की जरूरत है। (वेद मामूरपुर, नरेला, दिल्ली)

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नापाक मंसूबे

दहशतगर्दी को पनाह देने वाला पाकिस्तान आज खुद दहल उठा है। भारत के खिलाफ जहर उगलने के लिए पाकिस्तान की फैक्ट्री में तैयार होने वाले आतंकियों ने पाकिस्तान को ही दहला दिया, दूसरों के खिलाफ गड््ढा खोदने वाला पाकिस्तान आज खुद उस गड््ढे में गिरा नजर आ रहा है। आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता और न ही देश, उनका एक ही धर्म है दहशत फैलाना। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिन्हें वे मौत के घाट उतार रहे हैं, वे मासूम बच्चे हैं या फिर महिलाएं। उन्हें तो केवल दहशत फैलाने से मतलब है, जब तक पाकिस्तान दहशतगर्द संगठनों पर कठोर कार्रवाई के लिए दृढ़संकल्प नहीं होगा तब तक वहां शांति बहाली असंभव होगी।
(गौरव कुमार, दिल्ली)

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जानलेवा ठंड

इस बार ठंड अपने समय से बहुत बाद में आई, लेकिन बहुत-से लोगों के लिए आफत बन कर आई। जो गरीब घर चलाने के लिए अपना गांव छोड़ कर शहरों में पैसा कमाने जाते हैं, उन्हें मजबूरी और पैसों की कमी के कारण सड़कों या रेलवे स्टेशनों पर सोना पड़ता है। उनके लिए ठंड किसी सजा से कम नहीं, जिसके चलते बहुत से लोगों की मौत हो जाती है। ऐसा अभी दिल्ली में हुआ, जहां ठंड की वजह से सात लोगों की मौत हो गई। ये वे लोग थे, जिन्हें राजधानी के रैनबसेरों में जगह नहीं मिली और मजबूरी में सड़क पर सोना पड़ा। सरकार को इन मौतों का कारण जानना और रैनबसेरों की संख्या में इजाफा करना चाहिए। (याशिका मित्तल, आगरा)

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