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चौपालः नारों की सियासत

भौगोलिक सीमाएं देश का नक्शा तय करती हैं और देश के करोड़ो लोगों का संयुक्तिकरण राष्ट्र बनाता है।

Author April 8, 2016 3:07 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

भौगोलिक सीमाएं देश का नक्शा तय करती हैं और देश के करोड़ो लोगों का संयुक्तिकरण राष्ट्र बनाता है। राष्ट्र ध्वज, प्रतीक चिह्न, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, संविधान एक राष्ट्र के नागरिकों की सार्वभौमिकता, स्वाधीनता, स्वतंत्रता, गौरव, गरिमा और अस्मिता के प्रतीक होते हैं। इनके प्रति मन, वचन और कर्म से सम्मान व्यक्त करना राष्ट्रीयता की पहली और जरूरी शर्त है। हमारे संविधान ने इनके प्रति सम्मान के तरीकों और अवमान और इस पर दंड को भी स्पष्ट कर रखा है।

आजादी के आंदोलन के दौर से ही इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय, जय हिंद आदि नारे परंपरागत रूप से अवाम को प्रेरित करने, जागरूक, जुझारू और चेतना संपन्न बनाने के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं। इन्हें लेकर इतिहास में कोई विवाद दिखाई नहीं देता है। सवाल है कि आज अचानक नारों के आधार पर लोगों को विभाजित और उद्वेलित क्यों किया जा रहा है?

चुनाव के अवसर पर देश की जनता की आशा, आकांक्षा, आवश्यकता के लिए राजनीतिक पार्टियों की क्या नीतियां और योजनाएं होंगी, इसको रखा जाना चाहिए और इस पर बहस होना चाहिए। लेकिन व्यावहारिक रूप में हम पाते हैं कि ये बातें सिर्फ घोषणा पत्रों तक सीमित रहती हैं। घोषणा पत्र के क्रियान्वयन पर चर्चा और उसके आधार पर वोट न देने की परिपाटी ने राजनीतिक दलों की राह आसान कर दी है और वे भावनात्मक मुद्दों को उठाने में दक्ष हो गए हैं।

आज जब देश का बड़ा हिस्सा सूखे से जूझ रहा है, पीने के पानी के लिए कहीं धारा 144 का प्रयोग किया जा रहा तो कहीं तालाब पर सशस्त्र् गार्ड तैनात किए गए हैं, किसान, कर्जदार और छात्र लगातार आत्महत्या कर रहे हैं, बेरोजगारी और महंगाई लगातार बढ़ रही है, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं के बाजारीकरण ने लोगों के लिए इन सुविधाओं को प्राप्त करना दुश्कर बना दिया है, निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए युवाओं का बेतहाशा शोषण कर रही हैं, आतंक, तस्करी, नशे और भ्रष्टाचार ने तबाही मचाई हुई है, पर्यावरण बेहाल है। ऐसे में देश में नारों से राष्ट्रीयता निर्धारित करने की बहस कहीं इन मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश तो नहीं है?

‘भारत माता की जय’ नारे पर विवाद के क्रम में अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फड़णवीस जैसे लोग इसे अनावश्यक तूल देना चाहते हैं। लेकिन हालत यह हो गई है कि सोशल मीडिया पर कोई हर पोस्ट के पहले तो कोई अपने लिखे के अंत में हर बार ‘भारत माता की जय’ लिख रहा है। क्या यह इस नारे की स्वाभाविकता है? क्या यह इस नारे को प्रहसन में तब्दील करने की कोशिश है?

धर्म, जाति, संप्रदाय, नदी जल वितरण जैसे क्षेत्रीय संकीर्ण विवादों, खाप पंचायतों, फतवेबाजों, वैमनस्य पैदा करने वाले बयानवीरों के विरुद्ध मुखर होकर और सवा सौ करोड़ जन-गण की आशा, आकांक्षा की नीतियों और मुद्दों के लिए बहस, संघर्ष, प्रयास ही सच्चे अर्थों में राष्ट्रीयता का निर्धारण करेंगे। राष्ट्र के प्रति लोगों में अदम्य सम्मान, श्रद्धा और विश्वास है और वे इसे विभिन्न अवसरों पर अपने-अपने तरीके से अभिव्यक्त करते रहते हैं। ’सुरेश उपाध्याय, इंदौर, मप

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