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चौपालः हिंसा के निहितार्थ

पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में हुआ हिंसा का तांडव अत्यंत दुखद है। मीडिया रपटों के अनुसार जहां बीसियों लोग मारे गए वहीं सैकड़ों घायल हुए।

Author May 16, 2018 3:15 AM
पश्चिम बंगाल में सोमवार को बूथ पर मतदाताओं को जाने से रोका गया, जबकि बीजेपी समर्थक पर चाकू से वार किया गया। (फोटोः ANI)

पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में हुआ हिंसा का तांडव अत्यंत दुखद है। मीडिया रपटों के अनुसार जहां बीसियों लोग मारे गए वहीं सैकड़ों घायल हुए। मुख्य रूप से बंगाल काडर आधारित राजनीति का गढ़ है। यहां हर गली-मुहल्ले में पार्टी का कार्यालय होता है। एक रसूखदार व्यक्ति इसका मुखिया होता है। वह अपने अनुयायियों सहित अपनी पार्टी के प्रति समर्पित भी होता है। लेकिन यह समर्पण पैसे पर आधारित होता है। इनका वर्चस्व इतना है कि कभी-कभी प्रशासन को मूकदर्शक बनना पड़ता है। इनके लिए राजनीति पैसा कमाने का जरिया है, जनसेवा तो दूसरे दरजे की बात है। किसी भी चुनाव में यहां सदा से सत्तारूढ़ पार्टी का दबदबा रहा है। उसका मूल करण भी इसी काडर आधारित राजनीति में छुपा है। आप किसी भी बेरोजगार आदमी से पूछिए कि आप क्या करते हो? उसका जवाब होगा- ‘आमी पार्टी कोरछि’ अर्थात मैं तो पार्टी का कार्यकर्ता हूं। सत्ता परिवर्तन का अनुभव यहां जमीनी स्तर पर किए गए भारी भरकम आयोजनों से महसूस किया जा सकता है।

बंगाल का आम जनमानस काफी शांतिप्रिय और मिलनसार है। पर जो विष के बीज राजनीतिक दलों द्वारा बोए गए हैं उनका जहरीला फल धार्मिक आयोजनों में दिखता है, चुनावों में दिखता है। राजनीतिक पार्टियों के जो कार्यालय जगह-जगह क्लब के नाम पर खुले हैं, उन्हें पैसा मिलता है। दुर्गापूजा और अन्य त्योहारों में जम कर चंदा उगाही की जाती है। सूत्रवाक्य होता है- ‘चांदा तो दिते होवे’ अर्थात चंदा तो देना ही होगा। वोट का लोभ सभी राजनीतिक दलों में होता है। इसका लाभ मूल रूप से बांग्लादेश से आए हुए शरणार्थी उठाते हैं। पिछले दरवाजे से बहुत हद तक वे मतदाता बनने में सफल हुए हैं और कुछ क्षेत्रों में तो उनका दबदबा भी है। नतीजतन, तुष्टीकरण स्वाभाविक है। हिंसा का निहितार्थ ग्राम पंचायतों के चुनाव पार्टी-आधारित होने में भी है। इस कारण व्यक्तिगत प्रतिबद्धता का स्पष्ट पता चल जाता है। इससे राजनीतिक वैमनस्य की भावना पनपती है और गुटबाजी को बढ़ावा मिलता है जिसकी परिणति टूटता भाईचारा और बढ़ता विद्वेष है।

रामनवमी के अवसर पर बंगाल ने व्यापक हिंसा देखी है। मौजूदा पंचायत चुनाव उसी हिंसा की अगली कड़ी है। चुनावी हिंसा और धांधली की खबरें बहुत कुछ संकेत देती हैं। सत्ता जब इतनी असहनशील हो जाए कि विपक्ष का कोई स्थान ही न बचे तो ऐसे में लोकतंत्र की तलाश कठिन प्रतीत होती है। कितना भी आशावादी चश्मे से देखें तो निराशावाद हावी दिखता है। इस खेल में सारे दल शामिल हैं। सभी को अपने विस्तार की जल्दी है तो किसी को अपने स्थायित्व की, चाहे इसकी कीमत खून देकर क्यों न चुकानी पड़े। लोकशाही में हिंसा का स्थान नहीं है पर मूल्यों की राजनीति अब सिर्फ राजनीति विज्ञान की किताबों में सिद्धांत के रूप में अध्ययन और अध्यापन के लिए शेष है। वास्तविकता की कसौटी पर खरा उतरने की संभावनाएं क्षीण दिखाई पड़ती हैं। उम्मीद है, चीजें बदलेंगी और इस बदलाव में सभी को सहभागी होना होगा। तभी लोकतंत्र की आत्मा पाक-साफ रह पाएगी वरना लोकतंत्र सिर्फ कहने के लिए लोकतंत्र रहेगा, यह स्पष्ट दिख रहा है।

’अमरजीत कुमार, अंडाल, दुर्गापुर, प. बंगाल

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