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चौपालः प्लेटफार्म की बोली

पिछले दिनों मैं रेलगाड़ी में आरा से बनारस आ रही थी। मेरे पास टिकट तो था पर आरक्षण नहीं था। जबकि इस तरह आज कोई यात्रा नहीं करना चाहता, मैं भी नहीं।
Author May 20, 2016 03:34 am
(File Photo)

पिछले दिनों मैं रेलगाड़ी में आरा से बनारस आ रही थी। मेरे पास टिकट तो था पर आरक्षण नहीं था। जबकि इस तरह आज कोई यात्रा नहीं करना चाहता, मैं भी नहीं। लेकिन कभी-कभी न चाहते हुए भी कुछ ऐसा घटित होता है जिसका हमने कभी अनुमान भी नहीं लगाया होता। रेलगाड़ी तेज रफ्तार में चली जा रही थी। पूरी ट्रेन भरी हुई थी, कहीं खड़े रहने की भी जगह नहीं थी लेकिन फिर भी आसरा मिल गया शौचालय के पास। बहुत सुकून मिला क्योंकि जब भी दरवाजा खुलता और ठंडी हवा का झोंका शरीर को छूता तो मानो वह सब कुछ भूल जाती जिस स्थिति में मैं थी। बड़ी प्यास लगी थी क्योंकि आरा के प्लेटफार्म पर मैंने बहुत ढूंढ़ा कि कहीं नल मिल जाए तो पानी पी लूं ताकि मेरी बेरोजगारी का पैसा बच जाए मगर नल तो मिला पर उसमें पानी नदारद था। आखिर में वही हुआ, मेरे पर्स से पानी खरीदने में पंद्रह रुपए चले गए। मन बहुत खिन्न हुआ। एक भी नल में पानी न आने का क्या कारण था? क्या रेल प्रशासन को जानकारी नहीं थी कि गर्मी आ चुकी है, पानी ही नहीं मिलेगा प्लेटफार्म पर तो गरीब जनता, जो दो जून की रोटी का भी जुगाड़ नहीं कर पाती है, वह कैसे पानी खरीदेगी?

हम समझते हैं कि प्लेटफार्म पर नल खराब है लेकिन क्या यह जानने की कोशिश करते हैं कि क्यों खराब है? बोतलबंद पानी ज्यादा से ज्यादा बिके कहीं इसलिए तो यह सब नहीं किया गया! ऐसी अनेक आशंकाएं लिए मैं सफर करती रही। मेरे साथ कोई नहीं था लेकिन एक मुस्लिम नवयुवक की भी वही स्थिति थी जो मेरी थी। वह भी वहीं खड़ा था जहां मैं खड़ी थी। बातचीत शुरू हुई। जब हम मुगलसराय आए तो ट्रेन यार्ड में खड़ी हो गई। आधी रात का समय हो चुका था। मन में घबराहट भी थी कि अगर यह ट्रेन समय से पहुंचा देती तो घर जाने में सहूलियत होती। लेकिन ट्रेन यार्ड में ही खड़ी रही। तब उस युवक ने जो बात कही उतना तो मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी। उसने कहा, ‘मैडम! जानती हैं कि यह ट्रेन यहां क्यों खड़ी है?’ मैंने कहा कि कोई दूसरी ट्रेन आने वाली होगी। उसने बताया, ‘ऐसा नहीं है। अभी प्लेटफार्म बिकेगा!’

मैंने अचरज से पूछा, ‘प्लेटफार्म बिकेगा! इसका क्या मतलब है?’ वह कुछ इस अंदाज में मुस्कराया जैसे उसके लिए वह बहुत सामान्य बात हो। फिर समझाने लगा कि यहां प्लेटफार्म की बोली लगती है। जिस प्लेटफार्म पर ट्रेन खड़ी होगी उस प्लेटफार्म के दुकानदारों की ज्यादा से ज्यादा बिक्री होगी। इसी कारण दुकानदार वहां के अधिकारियों से संपर्क करते हैं। लगता है, अभी तय नहीं हो पा रहा है कि ट्रेन किस प्लेटफार्म पर लगे इसलिए देरी हो रही है। मैं आश्चर्य से उसे देखने लगी। उसकी बात सच ही है, यह निर्णय लेना मेरे लिए आसान नहीं था। लेकिन क्या सचमुच ऐसा होता है, यह सोचना अत्यंत भयावह जान पड़ रहा था…।
’रंजना पाण्डेय, बीबीएयू, लखनऊ

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