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योजना और भ्रष्टाचार

खाद्य सुरक्षा योजना की गड़बड़ियों के रोकथाम के लिए परिवर्तनीय राशन डीलरशिप सहित संबंधित अधिकारियों का मियादी बदलाव जरूरी है। भारतीय सतर्कता आयोग का सरकारी क्षेत्रों में लागू होने वाला आदेश खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर भी प्रभावी साबित हो सकता है।

देश में गरीबों के लिए चलने वाली अहम योजनाओं में खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को भ्रष्टाचार के चंगुल से बचाना एक चुनौती है। (प्रतीकात्मक फोटो)

देश में गरीबों के लिए चलने वाली अहम योजनाओं में खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को भ्रष्टाचार के चंगुल से बचाना एक चुनौती है। सरकारी योजनाओं में घुस चुके भ्रष्टाचार के वायरस ने योजनाओं को बीमार बना दिया है। इसमें कोई शक नहीं कि जिम्मेदार लोगों को इस योजना की पूरी परवाह है, मगर शातिरों के सामने सारी सावधानियां बेअसर हो जाती हैं। यह भी सच्चाई है कि अभाव में जी रहे गरीबों की आवाज इतनी बुलंद नहीं होती कि ऊंचे पदों पर बैठे लोगों तक फरियाद पहुंच सके। खाद्य सुरक्षा योजना की गड़बड़ियों के रोकथाम के लिए परिवर्तनीय राशन डीलरशिप सहित संबंधित अधिकारियों का मियादी बदलाव जरूरी है। भारतीय सतर्कता आयोग का सरकारी क्षेत्रों में लागू होने वाला आदेश खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर भी प्रभावी साबित हो सकता है। दूसरी तरफ महिला समितियों में डीलरशिप का रोटेशन नारी सशक्तिकरण को नया आयाम देने में सक्षम है। इन उपायों से शायद अच्छा विकल्प तैयार हो सके।
’एमके मिश्रा, रांची

पर्यावरण और दायित्व
पर्यावरण की समस्या आज भारत की ही नहीं, अपितु पूरी दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। विकास की सीढ़ियां चढ़ने में हम इतने लीन हो गए कि हमने वृक्षों को काट डाला, जंगल उजाड़ डाले, पेड़ लगाने बंद कर दिए, झीलों को पाट कर मॉल बना दिए। प्रदूषण की चिंता किए बिना हमने प्लास्टिक का प्रयोग किया और अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार ली। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21(प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) के तहत प्रत्येक सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह अपने नागरिकों को स्वस्थ एवं स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराए। यह नागरिकों का अधिकार है, लेकिन इसके साथ ही अनुच्छेद 51 (क) के तहत प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करना भी हमारा मौलिक कर्तव्य है। अपने मौलिक अधिकारों के लिए सदैव सजग रहने वाले हम भारतीय कर्तव्यों को निभाने में बहुत पीछे रह जाते हैं जिसके भयावह परिणाम आज सबके सामने हैं। पर्यावरण को बचाना केवल सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है, यह एक सामाजिक कर्तव्य है कि जिस समाज में हम सांस लेते हैं उसे सर्वप्रथम सांस लेने योग्य बनाए रखा जाए।
’मुकुल सिंह चौहान, दिल्ली

संवेदनहीनता का परिणाम
कहते हैं दुर्घटनाएं सबक देकर जाती हैं। पर क्या सच में? आज का समाज दुर्घटना को कुछ समय तक तो याद रखता है, परंतु गुजरते वक्त के साथ-साथ भुला भी देता है। हादसों के बाद सांत्वना देना, संवेदना प्रकट करना और गुस्से से खून खौलना तो जैसे आम है, परंतु यह खून जल्द ही ठंडा भी हो जाता है। ऐसा कब तक चलेगा, कब तक हम इतने असंवेदनशील बने रहेंगे। प्रत्येक दुर्घटना किसी न किसी लापरवाही के कारण ही होती है और अपनी गलती को न मानते हुए हम एक दूसरे पर ही आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं, सरकार को कोसते हैं, पुलिस प्रशासन को नकारा बताते हैं। परंतु वास्तविकता तो ये है कि हम बलात्कार, चोरी, तेजाब हमले, भीड़ हत्या जैसी बड़ी-बड़ी घटनाओं के बाद भी चेत नहीं रहे हैं। और हमारी यही लापरवाही ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देती है। सरकार और प्रशासन तो अपना काम करता है और करेगा भी। परंतु हमें भी सतर्क और जागरूक रह कर देश, शहर, घर और परिवार को सुरक्षित रखना होगा।
’एकता, आंबेडकर कॉलेज,दिल्ली विवि

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