उम्मीद में लोग

उत्तर प्रदेश के सबसे लम्बे गंगा एक्सप्रेस-वे पर नवम्बर में काम शुरू होने की तैयारी है, लेकिन फर्रुखाबाद से होकर न गुजरने पर इसका विरोध भी शुरू हो गया है।

सांकेतिक फोटो।

उत्तर प्रदेश के सबसे लम्बे गंगा एक्सप्रेस-वे पर नवम्बर में काम शुरू होने की तैयारी है, लेकिन फर्रुखाबाद से होकर न गुजरने पर इसका विरोध भी शुरू हो गया है। जनपद फर्रुखाबाद में बासठ किलोमीटर में गंगा नदी बहती हैं, लेकिन वहां पर गंगा एक्सप्रेस-वे नहीं गुजर रहा है। बल्कि ऐसे स्थान से होकर गुजर रहा है, जहां गंगा नदी नहीं हैं। विरोध प्रदर्शनों में ऐसी आवाजें सुनने को मिलती हैं कि फर्रुखाबाद ने भाजपा को एक सांसद और चार विधायक दिए, लेकिन वहां की जनता के साथ छल ही हुआ। अंदाजा यही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में यह सबसे बड़ा मुद्दा होने जा रहा है। विपक्षी दल भी इस मुद्दे को भुनाने में जुट गए हैं। चुनाव के परिणाम क्या होंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन यहां के लोगों को गंगा एक्सप्रेस-वे जिले से न गुजरने का मलाल जरूर है।
’मोहम्मद आकिब खान, फर्रुखाबाद, उप्र

शब्द संग्रह

जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा के संरक्षण के लिए आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, हिंदी भाषा के लिए उसी तरह का कोई मंच नहीं है। बदलते युग में अंग्रेजी भाषा के विस्तार के लिए अनेक शब्द इसके शब्दकोश में शामिल किए जा रहे हैं। अंग्रेजी भाषा ने आधुनिक युग में नए-नए अनुसंधानों से बहुत से शब्द प्रतिपादित किए हैं। हिंदी भाषा में इन शब्दों का कोई अनुवाद न होने के कारण अंग्रेजी भाषा के शब्दों को ही शामिल करना मजबूरी बन गई है। किसी समय में काशी हिंदू विश्विद्यालय हिंदी भाषा के संरक्षण और उत्थान के लिए जाना जाता था, लेकिन अब ऐसा होते हुए नहीं दिखता। हिंदी अकादमी ने हिंदी भाषा के लिए कितने नए शब्दों का आविष्कार किया है, यह पूछने की आवश्यकता है।

ऐसा नहीं है कि ऐसी समस्याएं केवल हिंदी भाषा के लिए हैं। अन्य भारतीय भाषाएं भी इनसे जूझ रही हैं। अंग्रेजी भाषा का बाहुल्य बढ़ता जा रहा है और अन्य भाषाएं अपने अस्तित्व के लिए हिचकोले खा रही हैं। बहुत संभव है कि आने वाली सदियों में कुछ क्षेत्रीय भाषाएं लुप्त हो जाएं। प्रत्येक वर्ष केवल हिंदी दिवस मनाने से इसका विकास नहीं होने वाला, बल्कि हिंदी भाषा के संरक्षण के लिए एक बड़े मंच की आवश्यकता है। हिंदी के उज्ज्वल भविष्य के लिए यह वक्त की जरूरत भी है।
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, नई दिल्ली

फिक्र की बात

जिस प्रकार दिन प्रतिदिन बढ़ती जनसंख्या देश के लिए एक गंभीर विषय है, उसी प्रकार दिन-प्रतिदिन सड़कों, चौराहों और गलियों में आवारा पशुओं की संख्या में इजाफा भी। स्वार्थी लोग जब तक इनसे लाभ मिलता है, तब तक इनको पालते है, लेकिन जब यही पशु बूढ़े हो जाते है, दूध नहीं देते तो इनके मालिक सड़क पर दर- दर की ठोकरें खाने को छोड़ देते हैं।

सड़क पर ठेला लगाने वालें, दुकान वाले, राहगीरों और अन्य लोगों द्वारा इनके ऊपर घातक प्रहार भी किया जाता है, जिसके कारण इन पशुओं को शारीरिक पीड़ा से भी जूझना पड़ता है। लगातार सड़कों पर इनकी बढ़ती संख्या के कारण आए दिन सड़क दुर्घटना भी देखने को मिल रहे है। ऐसे में इन खुले पशुओं के विषय में न सिर्फ जल्द से जल्द सरकार कोई उचित कदम उठाए, बल्कि इन्हें बेसहारा छोड़ने वाले इनके मालिकों को भी ऐसे कार्य करने पर उचित दंड का प्रावधान करे, ताकि संकीर्ण मानसिकता वाले लोग पशुओं को बेसहारा छोड़ने से पहले एक बार अंतर्मन में विचार कर सकें।
’श्याम मिश्रा, दिल्ली विवि, दिल्ली

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