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चौपालः सदन का काम

संविधान निर्माताओं ने जब हमारी संसद की कल्पना की तो उनके चार प्रमुख उद्देश्य थे। पहला कानून बनाना, दूसरा लोगों का प्रतिनिधित्व, तीसरा बजट पारित करना और चौथा सत्ता पक्ष पर निगरानी रखना।

Author April 12, 2018 3:47 AM
संसद भवन की इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

संविधान निर्माताओं ने जब हमारी संसद की कल्पना की तो उनके चार प्रमुख उद्देश्य थे। पहला कानून बनाना, दूसरा लोगों का प्रतिनिधित्व, तीसरा बजट पारित करना और चौथा सत्ता पक्ष पर निगरानी रखना। लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले वर्षों की तरह इस बार का शीतकालीन बजट सत्र भी इन उद्देश्यों की पूर्ति कम और शोर-शराबे का पर्याय ज्यादा बन कर रह गया। आंकड़ों के मुताबिक पहली लोकसभा के कार्यकाल में जहां 678 बैठकें हुर्इं और 319 विधेयक पारित हुए थे, वहीं पंद्रहवीं लोकसभा के कार्यकाल में महज 357 बैठकें हुर्इं और 181 विधेयक पारित हुए। इस बार के बजट सत्र में संपन्न विधायी कार्य को भी उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता। लोकसभा ने जहां चार प्रतिशत कार्य कर लोगों को निराश किया है तो दूसरी ओर उच्च सदन कही जाने वाली राज्यसभा में भी केवल दस प्रतिशत विधायी कार्य कतई अपेक्षित नहीं था।

घटती बैठकें और संसद को ठप करने वाला व्यवहार न सिर्फ हमारी संसद के मूल उद्देश्य व मान मर्यादाओं के विपरीत है बल्कि संसद में जनहित के मुद्दों पर चर्चा का अभाव हमारे जनप्रतिनिधियों की साख पर भी बट्टा लगने जैसा है। यह ठीक है कि हर सांसद और राजनीतिक दल को संसद में अपनी असहमति प्रकट करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन हमारे माननीयों को इस पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि जब किसी मसले का हल चर्चा के जरिए सदन में ढूंढ़ा जाना चाहिए या ढूंढ़ा जा सकता है तो अपनी मांगों को लेकर बैनर-तख्तियों व नारेबाजी के साथ संसद की कार्यवाही में अवरोध पैदा करने का क्या औचित्य है?

दरअसल, लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को सुचारु ढंग से चलाने के लिए यह बहुत जरूरी है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष कटुता छोड़ कर स्व-अनुशासन का परिचय दें। आवश्यक यह भी है कि नव निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। इसके अतिरिक्त सत्ता पक्ष को भी चाहिए कि वह सदन के बाहर प्रतिपक्ष से संवाद की पहल करे ताकि देश की सबसे बड़ी पंचायत में रचनात्मक बहस संभव हो सके।

’विनोद राठी, रोहतक

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