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चौपाल: जिम्मेदार कौन

पिछले कुछ दिनों से जब फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर या टिकटॉक के माध्यम से आपको कितने ही ऐसे संदेश प्राप्त हुए होंगे, जिनमें कोई कोरोना वायरस का इलाज नौवीं कक्षा की किसी किताब में होना बता रहा था, कोई हेलीकॉप्टर से सेनेटाइजर बरसाने की बात कर रहा था, कोई पुलिस की जगह सेना की तैनाती की बात कर रहा था, कोई चांद के उल्टा होने की बात कर रहा था, कोई बंदी तीन महीने तक बढ़ने की बात कर रहा था, तो कोई आपको ऐसे संदेश भेजता है कि उसका कोई परिचित डब्लयूएचओ में है, उससे हुई बातचीत के आधार पर आपको कुछ बताने का प्रयास कर रहा है।

Author Published on: April 2, 2020 12:02 AM

पिछले दिनों मीडिया में सड़कों पर भीड़ की भयावह तस्वीरें दिखीं। एक ओर देश के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र समेत देश के तमाम बड़े शहरों से पलायन करती भीड़ की ये तस्वीरें श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों के प्रति संवेदना पैदा करती हैं, तो दूसरी ओर कई आशंकाएं भी। इस वक्त जब पूरे देश की गति थमी हुई है और तमाम माध्यमों से यह खबर आम हो चुकी है कि कोरोना से लड़ने के लिए सामाजिक दूरी बना कर रखना आवश्यक है, तब सड़कों पर लाखों की संख्या में पसरी यह भीड़ वास्तव में डराने वाली है। देश में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या एक हजार से ऊपर पहुंच चुकी है, और अब यह स्थिति संक्रमण के तीसरे चरण की ओर बढ़ने की आशंका पैदा कर रही है, तब इस भीड़ ने यह आशंका पैदा कर दी है कि कहीं इस वायरस से संक्रमित कोई व्यक्ति हमारे समुदाय के बीच तो नहीं है। इस आशंका के बीच बड़ा प्रश्न यह है कि पलायन के लिए उकसाने के जिम्मेदार कहीं हम-आप तो नहीं हैं?

दरअसल, इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया का दुरुपयोग है। पिछले कुछ दिनों से जब फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर या टिकटॉक के माध्यम से आपको कितने ही ऐसे संदेश प्राप्त हुए होंगे, जिनमें कोई कोरोना वायरस का इलाज नौवीं कक्षा की किसी किताब में होना बता रहा था, कोई हेलीकॉप्टर से सेनेटाइजर बरसाने की बात कर रहा था, कोई पुलिस की जगह सेना की तैनाती की बात कर रहा था, कोई चांद के उल्टा होने की बात कर रहा था, कोई बंदी तीन महीने तक बढ़ने की बात कर रहा था, तो कोई आपको ऐसे संदेश भेजता है कि उसका कोई परिचित डब्लयूएचओ में है, उससे हुई बातचीत के आधार पर आपको कुछ बताने का प्रयास कर रहा है। निश्चित रूप से हम सबके पास इससे मिलते-जुलते तमाम संदेश पहुंचे भी होंगे और हम सबने इनमें से कुछ संदेशों को या तो सामान्य मजाक के तौर पर या बिना जांचे ही प्रामाणिक मान कर फॉरवर्ड भी किया होगा।

विचार करके देखिए तो तीन महीने बंदी वाला कोई संदेश आपके लिए सामान्य हो सकता है, लेकिन ऐसे वर्ग के लिए जो दिहाड़ी मजदूरी या अन्य किसी काम पर आश्रित है, उसके मन में भय पैदा करने के लिए क्या यह एक संदेश काफी नहीं है? खबर यह भी है कि पुलिस की जगह सेना की ड्यूटी लगाने की अफवाह फैलाने वाले और दो दिन के सार्वजनिक यातायात पुन: चालू हो जाने वाले कुछ लोगों पर रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सहित देश के तमाम बड़े शहरों से अपने गांवों की ओर पैदल ही पलायन करती इस भीड़ में बड़ी संख्या में अशिक्षित या अल्पशिक्षित समुदाय के वही लोग हैं, जो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होते संदेशों को प्रामाणिकता जांचे बिना या उनके स्रोतों की पुष्टि किए बिना ही सच मान लेते हैं।

यह किसी से छिपा नहीं है कि तमाम सांप्रदायिक दंगों के पीछे इसी वर्ग के लोगों की भावनाओं को इसी प्रकार के फर्जी संदेशों के माध्यम से भड़काया जाता है, दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगे इसके ताजा उदाहरण हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन संदेशों को तैयार कौन करता है? शायद हमारे बीच के ही कुछ लोग। पर समाज में अराजकता फैलाने के उद्देश्य से तैयार किए गए इन संदेशों को वायरल करने में हम सबकी भी भूमिका रहती है। सोशल मीडिया पर वायरल होते इन संदेशों के प्रति हमारे समाज को गंभीर होना ही होगा।

’पंकज यादव, बरेली

कुछ तो सोचो
दुनिया चिल्ला रही है, सरकारें गला फाड़-फाड़ कर कह रही हैं, मीडिया दिन-रात एक कर रहा है कोरोना वायरस के संक्रमण से लोगों को सावधान रहने के लिए। पर अफसोस, अब भी हमारे समाज में ऐसे लापरवाह लोग हैं, जो न तो अपनी, न अपनों की और न ही देश की फिक्र कर रहे हैं और सैकड़ों का हुजूम बनाए रख रहे हैं, तो कहीं विदेशों से आकर गुपचुप घर में छिप रहे हैं संक्रमित होते हुए भी। इस तरह खुद भी बीमार हो रहे हैं और औरों को भी कर रहे हैं। दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी मकरज में विदेशियों द्वारा धर्म प्रचार का काम चलता रहा, जिसमें करीब दो हजार लोगों ने शिरकत की। इसमें अनेक कोरोना संक्रमिक थे, जो देश के विभिन्न हिस्सों से आए थे। तेलंगाना में तो इनमें से छह लोगों की मृत्यु भी हो गई, अंडमान में दस संक्रमित पाए गए, तमिलनाडु में भी ये प्रचार के लिए गए थे। इन पर बड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि इन्हें अपनी लापरवाही का दंड मिले और फिर कभी ये ऐसे गलत कदम न उठाने पाएं।
’महेश नेनावा, इंदौर (मप्र)।

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