ताज़ा खबर
 

दावे और हकीकत

एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी ने दादरी घटना और मुंबई में शिवसेना के विरोध के कारण पाकिस्तानी गायक गुलाम अली का प्रस्तावित कार्यक्रम रद्द होने, इन दोनों को दुखद कहा है।

Author October 24, 2015 11:02 AM

एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी ने दादरी घटना और मुंबई में शिवसेना के विरोध के कारण पाकिस्तानी गायक गुलाम अली का प्रस्तावित कार्यक्रम रद्द होने, इन दोनों को दुखद कहा है। साथ ही उन्होंने पूछा कि इन दोनों घटनाओं में केंद्र सरकार की क्या भूमिका है? लेकिन प्रधानमंत्री ने इस मामले में अपना मुंह खोलने में जो देरी की, वह सामान्य नहीं कही जा सकती। इसके अलावा किसी भी गंभीर मामले और परिस्थितियों में आम लोग सदा ही प्रधानमंत्री की तरफ ही देखते हैं।

प्रधानमंत्री का सवाल सही है कि दादरी या गुलाम अली के कार्यक्रम के विरोध के मामलों में केंद्र की क्या भूमिका है। दादरी में जो हुआ वैसी दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक घटनाओं को होने से रोकने की जिम्मेदारी पूरी तरह उत्तर प्रदेश की सरकार और वहां के प्रशासन की होनी चाहिए। दोषियों को कड़ा दंड दिलाने की जिम्मेदारी भी उसी की है।

ऐसे ही महाराष्ट्र में गुलाम अली के कार्यक्रम का न होना और पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब के विमोचन कार्यक्रम का विरोध और भाजपा नेता रहे सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह पर कालिख पोतने की घटना भी दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक ही कही जा सकती है, जिसे राज्य सरकार को रोकना था। छत्रपति शिवाजी, जिनके नाम पर शिवसेना का नामकरण हुआ है, के बारे में कहा जाता है कि वे मुगलों से युद्ध के दौरान मुसलिम धर्मावलंबियों के प्रति सहिष्णु थे- शत्रु पक्ष की भी महिलाओं के सम्मान और पवित्र कुरान का आदर करते थे।

HOT DEALS
  • Sony Xperia XZs G8232 64 GB (Ice Blue)
    ₹ 34999 MRP ₹ 51990 -33%
    ₹3500 Cashback
  • Sony Xperia L2 32 GB (Gold)
    ₹ 14845 MRP ₹ 20990 -29%
    ₹1485 Cashback

शिवसेना कालिख पोतने जैसी अपनी करतूतों को देश-भक्ति और बहादुरी का प्रमाण मानती है। मुझे याद है कि जब वाजपेयीजी प्रधानमंत्री थे तब भारत- पाकिस्तान क्रिकेट मैच के विरोध में शिव सैनिकों ने मैदान की पिच खोद दी थी और वाजपेयीजी ने नसीहत दी थी कि उसे देश की सीमा पर अपनी बहादुरी दिखानी चाहिए थी, रात के अंधेरे में मैदान की पिच खोद देना कोई बहादुरी नहीं है।

अगर प्रधानमंत्री देशहित सर्वोपरि होने की बात से सहमत हैं तो उन्हें ऐसे मामलों पर स्पष्ट और कठोर बयान देने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत में सहिष्णुता की परंपरा और संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता का अधिकार हर हाल में सुरक्षित रहे। असहमति या विरोध की भी छूट होनी आवश्यक है, लेकिन इसके तरीके हिंसा, कालिख पोतने, उग्र प्रदर्शन या सार्वजनिक संपत्ति को तोड़ने-जलाने आदि स्वीकार्य नहीं हैं।
’कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App