ताज़ा खबर
 

चौपालः किसान का दुख

समकालीन भारत में किसानों का प्रतिरोध और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल आज ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। भारत में किसानों को आमतौर पर निम्नवर्गीय श्रेणी के रूप में देखा-समझा जाता है जो औपनिवेशिक काल से लेकर अब तक शासित और शोषित है, जो हमेशा परिवर्तन की मांग करते हैं।

Author October 28, 2016 2:24 AM

समकालीन भारत में किसानों का प्रतिरोध और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल आज ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। भारत में किसानों को आमतौर पर निम्नवर्गीय श्रेणी के रूप में देखा-समझा जाता है जो औपनिवेशिक काल से लेकर अब तक शासित और शोषित है, जो हमेशा परिवर्तन की मांग करते हैं। इस परिवर्तन के लिए किसानों को प्रतिरोध करना पड़ता है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी का राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से विरोध करना होता है या अपनी पहचान को स्थापित करने के प्रयास को प्रतिरोध मानते हैं।
भारत में औपनिवेशिक काल से लेकर अब तक कृषि उपेक्षित रहा है। किसानों का सरकार, साहूकार और जमींदारों से कर्ज का ही संबंध रहा है। औपनिवेशिक दौर में किसानों ने जमींदारों, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी और कर प्रणाली के खिलाफ प्रतिरोध किया था। संथाल विद्रोह से लेकर अब तक के मुख्य किसान विद्रोहों के माध्यम से किसानों के प्रतिरोध को समझा जा सकता है। इस प्रतिरोध को एकजुट करने में अभिजात और राजनीतिक दलों का भूमिका अहम थी। इसके कारण कुछ राष्ट्रीय नेता और दल उभर कर आते हैं, जो किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रतिनिधित्व शब्द का आशय यह है कि वर्तमान को दोबारा से निर्माण करना होता है। किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे नेता और दल किसानों के हित को प्रस्तुत कर रहे थे। यह प्रतिरोध और प्रतिनिधित्व आजादी के बाद भी नजर आता है।