ताज़ा खबर
 

चौपाल

कथनी और करनी

चौपाल के अंतर्गत छपे ‘सुरक्षा के मोर्चे’ (8 दिसंबर) में शिबन कृष्ण रैणा का मत है कि जब उरी सेक्टर में गोलीबारी हो रही...

नापाक करतूत

जब भी पाकिस्तान किसी घरेलू मोर्चे पर विफल होता है तो वह कश्मीर का मसला जोर-शोर से उछाल कर अपनी विफलता को ढंकना चाहता...

धर्म की राजनीति

इतिहास से हमने यह सीखा कि हमने इससे कुछ नहीं सीखा! मध्ययुग में अरब और तुर्क आक्रमणकारी अपने धर्म का प्रचार करने के लिए...

भरोसे की बात

वर्षाजी ने अपनी टिप्पणी ‘प्रतिवाद के पायदान’ (जनसत्ता, 17 नवंबर) में संतुलित तरीके से बात कहने की कोशिश की है। इस विषय में कोई...

शिक्षा का सुध

अरमान की टिप्पणी ‘विषमता का पाठ’ (दुनिया मेरे आगे, 8 दिसंबर) में आमना जैसे बच्चों का या उनकी ओर से यह सवाल बिल्कुल सही...

सदन का काम

संसद के दोनों सदनों का कोई भी सत्र ऐसा नहीं जाता जिसमें बीस-पच्चीस प्रतिशत समय हंगामे की भेंट न चढ़े। विपक्ष में चाहे कोई...

प्रजातंत्र से खेल

प्रजातंत्र की नींव जागरूक मतदाता है। सुप्त मतदाताओं को जगाने के लिए ही शासन और समाज द्वारा अभियान चलाया गया- ‘पहले मतदान, फिर जलपान’...

क्रांतिकारी की याद

कुलदीप कुमार ने ‘अंदर की असमानता’ (निनाद, 30 नवंबर) में विख्यात क्रांतिकारी राजा महेंद्रप्रताप को याद किया है, भले ही वह अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय...

भ्रम की राजनीति

गिरिराज किशोर के लेख ‘अनिवार्य मतदान से फायदा या नुकसान’ (20 नवंबर) में जिस तरह अनिवार्य मतदान के संबंध में चिंता जाहिर की गई...

सुरक्षा के मोर्चे

जिस दिन उत्तरी कश्मीर (बारामूला जिले) के उरी सेक्टर की एक सैन्य छावनी पर पाक समर्थित आतंकियों के नापाक हमले को विफल करते हमारी...

भोपाल के सबक

विश्व की सबसे भयानक औद्योगिक त्रासदी के नाम से चर्चित भोपाल गैस रिसाव कांड को तीस साल पूरे हो गए। दो-तीन दिसंबर 1984 की...

हंगामा है क्यों बरपा

केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति के अभद्र बयान पर बवाल खड़ा हो गया है। सालों-साल बीत जाते हैं सकारात्मक काम करते तो भी मीडिया इतना...

राजनीति का धर्म

कोई भी धार्मिक यात्रा और जुलूस या मुहर्रम के ताजिये हों, उनके आगे नाचते, लाठियां चलाते, मुंह से झाग निकालते, आसपास चलते लोगों पर...

बेटी की जगह

कुछ दिन पहले मैंने अपने घर वालों से कहा कि बहुत रात हो गई है, मेन गेट बंद कर दो, तो दादीजी ने कहा...

बाबाओं का राज

देश में न स्वराज दिख रहा है, न सुराज। हां, बाबाओं का राज जरूर हर तरफ दिख रहा है। अलग-अलग ‘राम’ नामी बाबाओं में...

कैसा समाज हित

कहां और कौन-सी कमी रह गई जिसके कारण हम इंसान को केवल इंसान मानने की सलाहियत पैदा नहीं कर पाए? कहीं मुसलिम ग्रंथि तो...

सुधार की दरकार

तवलीन सिंह का लेख ‘सुधार का लंबा होता इंतजार’ (वक़्त की नब्ज, 30 नवंबर) पढ़ा। इसमें ऐसे व्यक्ति का जिक्र है जिसने पिछले एक...

ये दोषी

हिसार के बाबा रामपाल से ज्यादा दोषी वे भक्त हैं जो लाठी, पत्थर, हथियार लिए बाबा का इहलोक सुधारने की जिद कर बैठे थे!...