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चौपाल

बाल साहित्य की जगह

प्राथमिक और विश्वविद्यालयी उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं का बाल साहित्य, विशेषकर हिंदी बालसाहित्य किस तरह उपेक्षा का शिकार बना हुआ है,...

आभासी का असर

सिनेमा एक बड़ा जनमाध्यम है और समाज का आईना भी। पर आज का सिनेमा व्यवसायीकरण की ऐसी अंधी दौड़ में शामिल है, जो अपने...

आहत भावनाएं

क्या हम इतने असहिष्णु हो गए हैं कि छोटी-छोटी बातों को तिल का ताड़ बना दे रहे हैं? क्या फिल्म पीके का विरोध धर्म...

नई रणनीति की जरूरत

आम आदमी पार्टी ने शासक के बजाय सच्चा सेवक बन कर राष्ट्र सेवा की बात कही थी और भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का भरोसा...

हिंसा का दुश्चक्र

पेशावर में सैनिक स्कूल के बच्चों और किशोरों पर हुआ मर्मांतक हमला केवल पाकिस्तान नहीं, पूरे विश्व के लिए एक खुला सबक है। सबक...

जाति की जंजीर

धर्मांतरण पर मचे बवाल के संदर्भ में मेरा सवाल है कि जब हम धर्म-परिवर्तन कर सकते हैं तो जाति-परिवर्तन क्यों नहीं? हो सके तो...

नापाक करतूत

जब भी पाकिस्तान किसी घरेलू मोर्चे पर विफल होता है तो वह कश्मीर का मसला जोर-शोर से उछाल कर अपनी विफलता को ढंकना चाहता...

सम्मान का छल

भारत रत्न के नाम पर मोदी सरकार ने जो वैचारिक-रणनीतिक घपला मालवीयजी के साथ किया है, वह सरदार पटेल के साथ किए गए छल...

उम्मीद का वोट

जम्मू-कश्मीर में (त्रिशंकु) चुनाव नतीजों के मद्देनजर सत्ता के समीकरण मुख्य रूप से पीडीपी, भाजपा और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच बिठाए जा रहे हैं...

मोदी के सामने

अशोक लाल के सारगर्भित पत्र ‘बेचारे नरेंद्र भाई’ (चौपाल, 23 दिसंबर) ने तवलीन सिंह के लेख ‘विकास के बजाय’ (14 दिसंबर) पढ़ने को बाध्य...

भ्रम के नारे

लगातार सामने आ रहे घटनाक्रमों से अब यह लगने लगा है कि नारे केवल भरमाने के औजार रह गए हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के...

दोहरेपन की मार

दहशत के ठिकाने’ (संपादकीय, 18 दिसंबर) पढ़ा। पाकिस्तान के पेशावर में जो हैवानियत हुआ, उससे उपजे दुख के लिए शब्द भी कम पड़ गए...

विमर्श की जरूरत

धर्मांतरण पर उठी बहसों के बीच संविधान के विश्वास या आस्था के अधिकार का सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या किसी प्रलोभन से रहित आस्था...

राजनीति के रंग

दिल्ली में एनडीएमसी यानी नई दिल्ली नगर परिषद ने यातायात नियमों को ताक पर रख कर सड़कों के दोनों किनारों और विभाजक पत्थरों को...

बेचारे नरेंद्र भाई

आदरणीय नरेंद्र भाई, तवलीन (सिंह) बेन का 14 दिसंबर के जनसत्ता में छपा लेख, ‘विकास के बजाय’ पढ़ कर गला भर आया। कहां आप...

पितृसत्ता की परतें

पिछले कुछ दिनों से हरियाणा की दो बहनें, बस में कथित छेड़छाड़ के विरोध में तीन लड़कों से भिड़ने और उनकी बेल्ट से पिटाई...

आहार पर प्रहार

विष्णु नागर की टिप्पणी ‘आहार का चुनाव’ (दुनिया मेरे आगे, 11 दिसंबर) बड़ा ही रोचक और संतुलित है। नागरजी का यह विचार बिल्कुल ठीक...

बेतुके फरमान

आश्चर्य है कि जिस सैद्धांतिक बिंदु पर क्रिसमस के दिन ‘सुशासन दिवस’ मनाने के कथित आदेशों की आहटों का संसद तक में पुरजोर विरोध...