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सम्मान अनमोल है

कई लोग किसानों को अन्नदाता मानने से इनकार करते हैं। इसके लिए अजीब तर्क देते हैं और कहते हैं कि हम तो अपने पैसों से अनाज खरीदते हैं तो फिर भला किसान कैसे अन्नदाता हो गए!

Respetसांकेतिक फोटो।

कई लोग किसानों को अन्नदाता मानने से इनकार करते हैं। इसके लिए अजीब तर्क देते हैं और कहते हैं कि हम तो अपने पैसों से अनाज खरीदते हैं तो फिर भला किसान कैसे अन्नदाता हो गए! इस नजरिए से देखा देखा जाए तो फिर चिकित्सकों को भी क्यों महत्त्व देना चाहिए? चिकित्सक भी तो पैसों के लिए ही काम करते हैं।

फिर उन्हें हम इतना महत्त्व क्यों देते हैं। इसी प्रकार, हमारे देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले हमारे जवान हैं। उन्हें भी हम बहुत सम्मान देते हैं। उन्हें भी वेतन मिलता है। लेकिन सब कुछ केवल पैसा और चुकाई गई कीमत नहीं होती। जिस प्रकार एक चिकित्सक किसी के जीवन को बचाने का प्रयास करता है, इसलिए वह महत्त्वपूर्ण है और जिस तरह देश के जवान सरहदों पर दिन-रात निगरानी करते हैं, ताकि हम चैन की नींद सो सकें, वह अहम है और इसीलिए हम उनका इतना सम्मान करते हैं। इसी तरह, किसान भी दिन- रात, सर्दी, गर्मी, बरसात या तूफान, सब कुछ सहन करके हमारे लिए अन्न पैदा करता है। इसलिए हम उसे अन्नदाता कहते हैं।
’नवीन थिरानी, नोहर, राजस्थान

इंसाफ की कसौटी

स्वतंत्र अदालतें और कानून व्यवस्था बिना किसी लागलपेट और सत्ता के प्रभाव को दरकिनार कर सजा सुनाती हैं। इस लिहाज से देखें तो फ्रांस की न्याय-व्यवस्था की जितनी भी तारीफ की जाए, वह कम है। एक नहीं, बल्कि दो पूर्व राष्ट्रपतियों को सजा सुनाई जा चुकी है।

पहले याक शिराक और अब निकोलस सरकोजी। दोनों राष्ट्रपतियों पर भ्रष्टाचार और पद का दुरुपयोग पर मुकदमा चला। 2011 में याक शिराक को दो साल और अब 2021 में सरकोजी को तीन साल की सजा सुनाई गई। फ्रांस के आधुनिक इतिहास में इन दोनों सजाओं को इतिहास के पन्नों में दर्ज किया जाएगा। उम्मीद करनी चाहिए कि वर्तमान में एमैनुएल मैक्रॉन समेत आने वाले तमाम राष्ट्रपतियों को ये दोनों फैसले अपने पद का दुरुपयोग करने से रोकेंगे।
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

स्वदेशी का दम

प्रधानमंत्री ने टीकाकरण के तीसरे चरण में भारत बायोटेक की कोवैक्सिन लगवा कर तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए स्वदेशी पर भरोसा जताया। वास्तव में भारत में बना जो टीका प्रधानमंत्री ने लगवाया है उसकी मांग विश्व के वे देश भी कर चुके हैं जो स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं में भारत से कही आगे हैं। यह संभव हो पाया है भारतीय वैज्ञानिकों के दिन-रात के परिश्रम, उनके अनवरत प्रयासों और सरकार के स्वदेशी पर जोर देने से। भारत इस टीका को हिंद महासागरीय देशों में और म्यांमा से लेकर सेशेल्स तक कई देशों को यह टीका उपलब्ध करवा चुका है जो उसकी टीका कूटनीति का भी एक हिस्सा है।
’पारस जैन, मेरठ, उप्र

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