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चौपालः जनमत बनाम संविधान

बात 2001 की है... विधानसभा चुनाव हो रहे थे। तांसी भूमि घोटाले में जयललिता दोषी सिद्ध हो कर चुनाव लड़ने की पात्रता खो चुकी थीं। फिर भी उन्होंने नामांकन भर दिया जिसे चुनाव आयोग ने खारिज कर डाला।

Author February 11, 2017 1:59 AM

बात 2001 की है… विधानसभा चुनाव हो रहे थे। तांसी भूमि घोटाले में जयललिता दोषी सिद्ध हो कर चुनाव लड़ने की पात्रता खो चुकी थीं। फिर भी उन्होंने नामांकन भर दिया जिसे चुनाव आयोग ने खारिज कर डाला। चुनाव के बाद जयललिता के दल को बहुमत मिलता है। कानून और संविधान को धता बताते हुए उनकी पार्टी उन्हें विधायक दल का नेता चुन लेती है। अपात्र होने के बावजूद वे तत्कालीन राज्यपाल, जो सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश रह चुकीं थीं, मीरा साहिब फातिमा बीबी के पास सरकार बनाने का दावा लेकर जाती हैं। विपक्षी दल राज्यपाल से उन्हें शपथ न दिलाने की गुहार करते हैं मगर राज्यपाल का तर्क है कि वे विधायक दल के नेता को शपथ दिलाने के लिए मजबूर हैं। इस तथ्य को भूलते हुए कि जिन जयललिता को वे राज्य की मुखिया नियुक्त करने जा रही हैं वे इस पद के लिए सबसे जरूरी अर्हता अर्थात- विधायकी- हासिल नहीं कर सकतीं। लगे हाथ तर्क भी देती हैं कि संविधान में कहां कहा गया है कि मुख्यमंत्री का विधायक होना जरूरी है! राज्यपाल अपने विवेक का इस्तेमाल न करते हुए लोकमत और चुनावी जनमत में बह जाती हैं और शपथ दिला देती हैं। इसके तुरंत बाद सर्वोच्च न्यायालय सक्रिय होता है और जयललिता को बर्खास्त कर दिया जाता है!

सोलह साल बाद तमिलनाडु की सियासत फिर एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। 2016 के विधानसभा चुनावों में पांच साला बहुमत की नेता जयललिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। जैसा कि उनके जीवन काल में प्राय: हुआ, उनकी अनुपस्थिति में ओ पन्नीरसेल्वम को कमान दी जाती रही है। उनके हमेशा के लिए गैरहाजिर होने पर भी कमान उन्हें ही मिली। मगर तमिलनाडु का लोकमत या जनमत जो कि हमेशा नेता की बजाय माई-बाप की सत्ता में यकीन करता है, अम्मा के बाद चिन्नमा (मौसी) के लिए आवाज उठा रहा है। सवाल लोकमत की इस आवाज की वैधता पर भी है, क्योंकि यह चुनावी जनमत नहीं है। ऐसे में करिश्माई नेताओं के क्रम में अनमेल लो प्रोफाइल मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम का इस्तीफा हो गया। राज्यपाल ने उसे स्वीकार भी कर लिया है। फिर भी वे सरकार को पुनर्जीवित करने की मंशा रखते हैं! इसी दावे के साथ बहुमत की लाठी तक भांज रहे हैं।

दूसरी ओर पार्टी की अध्यक्ष वीके शशिकला नटराजन, जिन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा, अपने वफादारों के दम पर नेता विधायक दल का चुनाव जीत कर राज्यपाल से शपथ लेने की गुहार लगा चुकी हैं। इन सबके बीच राज्यपाल बेहद शांत हैं। यहां उनके पास फातिमा बीबी की तरह जनमत और संविधान के द्वंद्व में से एक को चुन लेने की भी छूट नहीं है। यहां दोनों ही नेता जनमत के प्रतिनिधि नहीं हैं। निगाहें राज्यपाल पर टिकी हैं। निर्णय चाहे जो हो, इसे संविधान की एक नई व्याख्या के साथ ही और भारतीय राजनीति की चंद बेहद अहम घटनाओं में शुमार किया जाएगा।
’अंकित दूबे, जनेवि, दिल्ली

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