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चौपालः आधी आबादी का हाल

हाल में एक खबर ने खूब सुर्खियां बटोरी। एक इंजीनियर पति अपनी बीवी को इसलिए प्रताड़ित करता था क्योंकि उसे रोटी बीस सेंटीमीटर गोल चाहिए थी।

Author March 30, 2018 3:50 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल में एक खबर ने खूब सुर्खियां बटोरी। एक इंजीनियर पति अपनी बीवी को इसलिए प्रताड़ित करता था क्योंकि उसे रोटी बीस सेंटीमीटर गोल चाहिए थी। यह सोच कर शर्म आती है कि आज भी क्या हाल है आधी आबादी का। महिलाओं के सशक्तीकरण पर चाहे कितनी ही गोष्ठियां-सम्मेलन हो जाएं, पर महिलाओं के हाल में कोई खास सुधार नहीं होने वाला। इसकी वजह यह है कि हमारा समाज ही ऐसा है, सोच ही ऐसी है जो महिलाओं को दूसरे पायदान पर रखती है। अगर महिलाओं को लेकर किसी की मानसिकता अच्छी नहीं है तो इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति अनपढ़ है या पढ़ा लिखा। एक घरेलू महिला हो या कामकाजी महिला, ज्यादातर महिलाएं मानसिक प्रताड़ना से त्रस्त हैं। महिलाओं के बारे में सोच में बदलाव जिस गति से होना चाहिए, वैसा नहीं है। ऐसी शिक्षा भी किस काम की जो समानता नहीं सिखाती।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि इसके लिए हम आखिर किसको दोष दें? आज महिलाओं की जो हालत है उसके लिए सबसे बड़ी दोषी खुद महिलाएं ही हैं जो खुद महिला होते हुए बेटे-बेटी में भेद करती हैं। ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जो बेटी होने पर शोक मनाने लगती हैं, घर में बेटे-बेटियों में अंतर उनके द्वारा ही किया जाता है। बेटियों को बार-बार ये समझाया जाता है या कहें कि उनके खून में डाल दिया जाता है कि उन्हें झुकना होगा, क्योंकि वे लड़की हैं। जब यही बेटियां सुसराल जाती हैं तो उन्हें यही सिखाया जाता है कि अब वही उनका घर है, उन्हें अब सब सहन करना होगा, क्योंकि अब उनका ससुराल ही उनका सब कुछ है।

वहीं ऐसी औरतों की भी कमी नहीं जिनके घर में बहुओं को किसी बाई से ज्यादा नहीं समझा जाता। यही वजह है कि हमारे समाज मे ‘सास’ शब्द को ही नकारात्मक नजरिए से देखा जाता है। सच यह है कि हमारे देश में महिलाओं की हालत दयनीय है, चाहे वह पढ़ी-लिखी हो या न हो। यही सोच उन्हें कभी भी आगे नही बढ़ने देगी। कम से कम आज की पीढ़ी की महिलाओं से इतनी उम्मीद की जा सकती है कि वे अपनी सोच छोटी न रखे, अपने बेटों को और बेटियों दोनो को महिलाओं की इज्जत करना सिखाएं।
’डॉ. शिल्पा जैन, वारंगल।

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