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चौपालः टूटती उम्मीदें

जन लोकपाल के मुद्दे पर गांधीवादी अण्णा हजारे के आंदोलन से आम आदमी पार्टी अस्तित्व (आप) में आई थी। अंतत: अण्णा और उनका आंदोलन नेपथ्य में चला गया।

Author September 10, 2016 2:27 AM
गांधीवादी अण्णा हजारे

जन लोकपाल के मुद्दे पर गांधीवादी अण्णा हजारे के आंदोलन से आम आदमी पार्टी अस्तित्व (आप) में आई थी। अंतत: अण्णा और उनका आंदोलन नेपथ्य में चला गया। उसी तरह जैसे बीज से पौधा और फिर वृक्ष बनने की प्रक्रिया में बीज नहीं रह जाता। अण्णा के विरोध और स्पष्ट मतभेद के बावजूद भारत के लोगों को ‘आप’ से बहुत अपेक्षाएं थीं। इसका आधार संभवत: लोगों की यह धारणा थी कि वह एक उच्च नैतिक मूल्यों से युक्त आंदोलन से निकली है जो छोटी-सी धारा ही सही, मैली गंगा समान भारतीय राजनीति की मुख्यधारा से बेहतर है और धीरे-धीरे भारत की राजनीति का कायाकल्प कर देगी।

दिसंबर 2013 में जब ‘आप’ को पहले निर्वाचन में ही दिल्ली में 28 सीटों के साथ बिल्कुल अप्रत्याशित सफलता मिली थी तो केवल दिल्ली नहीं, सारा देश और भारत के बाहर रह रहे आप्रवासी भी आनंदित थे। लेकिन दिल्ली की पहली सफलता के तुरंत बाद ही ‘आप’ की बढ़ती महत्त्वाकांक्षाएं चिंतित कर रही थीं। एक छोटी-सी नवोदित पार्टी अब पूरे देश पर राज करने का सपना देख रही थी बजाय अपने को दिल्ली पर केंद्रित करने के। उस दौरान मुझे बीबीसी रेडियो के एक कार्य्रक्रम में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता दिलीप पांडे से संवाद का मौका मिला था तो मैंने पूछा था कि उन्हें विस्तार की जल्दी है, लेकिन बड़ी संख्या में अच्छे और बेदाग लोग मिलेंगे कहां से? वर्तमान समाज में उच्च नैतिक मूल्यों वाले लोग बहुत खोजने पर ही मुश्किल से मिलते हैं। लेकिन प्रवक्ता ने बहुत आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया था कि वे दल में लोगों को लेने से पहले सबकी ‘स्क्रीनिंग’ करेंगे।

सब जानते हैं कि 2014 में जब दुबारा दिल्ली में चुनाव हुए तब बहुत सारे ऐसे लोगों को टिकट दिए गए जो पार्टी की घोषित ऊंची विचारधारा से कतई मेल नहीं खाते थे। लेकिन इन सबको अनदेखा करके दिल्लीवासियों ने केजरीवाल के नेतृत्व को जितनी बड़ी संख्या में वोट दिए वह अपने आप में कीर्तिमान ही है। लेकिन पार्टी के अंदर शुरू से अब तक जो कुछ हुआ- संस्थापकों में शामिल प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे नेताओं को बेइज्जत करके बाहर निकाला जाना, केजरीवाल की तानाशाही और इसके विधायकों और मंत्रियों पर एक के बाद एक आपराधिक मामले दर्ज होना- वह उन अपेक्षाओं के निर्मम कत्ल के सिवाय कुछ नहीं जो भारतीय जनता ने दिलों में संजोकर रखी थीं। केजरीवाल यह दावा भले ही करें कि वे आरोप लगते ही आरोपी को हटा रहे हैं और अपने दल के लोगों को बचा नहीं रहे हैं, जो एक हद तक ठीक भी है। लेकिन एक छोटे-से नवोदित दल के विधायक व मंत्री इतनी बड़ी संख्या में दुराचरण और भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाएं यह अपने आप में बहुत गंभीर मामला बनता है।
’कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

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