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चौपालः दुरुस्त आयद

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने लगभग पच्चीस साल पुरानी दो चुनाव याचिकाओं के निराकरण के फैसले में कहा कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है।

Author Updated: January 7, 2017 2:11 AM

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने लगभग पच्चीस साल पुरानी दो चुनाव याचिकाओं के निराकरण के फैसले में कहा कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है। माननीय न्यायालय के बहुमत (4:3) के फैसले ने धर्म, संप्रदाय, जाति व भाषा के आधार पर वोट अपील को भ्रष्ट आचरण ठहराया है और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) को प्रत्याशी के साथ अन्य पर भी लागू माना है। इस फैसले का व्यापक असर होगा और धर्म, संप्रदाय या जाति के ठेकेदारों के फतवों व अपीलों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।

लेकिन इस फैसले के दूसरे ही दिन बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने अपनी पार्टी के प्रत्याशियों की घोषणा 87 दलित, 97 मुस्लिम, 66 ब्राह्मण, 36 क्षत्रीय, 11 कायस्थ, वैश्य व पंजाबी तथा 106 अन्य पिछड़ा वर्ग में वर्गीकृत करके की। उसी शाम एक खबरिया चैनल ने लोकनीति व सीएसडीएस की सर्वे रिपोर्ट से धार्मिक व जातीय आधार पर समाजवादी पार्टी को यादवों, बहुजन समाज पार्टी को जाटवों, भारतीय जनता पार्टी को सवर्णों के वोट अधिक प्रतिशत में मिलने आदि की संभावना व्यक्त की। क्या इस प्रकार उम्मीदवारों की घोषणा और सर्वे रिपोर्ट तैयार व सार्वजनिक करना संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की भावना के अनुकूल है या ये भी भ्रष्ट आचरण माने जाएंगे?

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्य के महत्त्व को रेखांकित करने के साथ उसे अक्षुण्ण रखने और चुनावी शुचिता के लिए स्वागतयोग्य महत्त्वपूर्ण पहल की है। सभी राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे धर्म, जाति, संप्रदाय, भाषा के आधार पर प्रत्याशी चयन के बजाय अपने निष्ठावान व प्रतिबद्ध सदस्यों को प्राथमिकता देंगे और चुनाव को विकास के मुद्दों व विचारधारात्मक बहस पर केंद्रित करेंगे। इतने महत्त्वपूर्ण मामले पर फैसले में पच्चीस वर्ष की देरी न्यायिक प्रक्रिया को तीव्र करने की आवश्यकता भी बताती है।
’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

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